Category: धर्मवीर भारती

उतरी शाम

झुरमुट में दुपहरिया कुम्हलाई खोतों पर अँधियारी छाई पश्चिम की सुनहरी धुंधराई टीलों पर, तालों पर इक्के दुक्के अपने घर जाने वालों पर धीरे-धीरे उतरी शाम ! आँचल से छू …

दिन ढले की बारिश

बारिश दिन ढले की हरियाली-भीगी, बेबस, गुमसुम तुम हो और, और वही बलखाई मुद्रा कोमल शंखवाले गले की वही झुकी-मुँदी पलक सीपी में खाता हुआ पछाड़ बेज़बान समन्दर अन्दर …

ढीठ चांदनी

आज-कल तमाम रात चांदनी जगाती है मुँह पर दे-दे छींटे अधखुले झरोखे से अन्दर आ जाती है दबे पाँव धोखे से माथा छू निंदिया उचटाती है बाहर ले जाती …

बोआई का गीत

गोरी-गोरी सौंधी धरती-कारे-कारे बीज बदरा पानी दे ! क्यारी-क्यारी गूंज उठा संगीत बोने वालो ! नई फसल में बोओगे क्या चीज ? बदरा पानी दे ! मैं बोऊंगा बीर बहूटी, इन्द्रधनुष सतरंग नये …

बरसों के बाद उसी सूने- आंगन में

बरसों के बाद उसी सूने- आँगन में जाकर चुपचाप खड़े होना रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना मन का कोना-कोना   कोने से फिर उन्हीं सिसकियों का उठना फिर आकर …

फागुन की शाम

घाट के रस्ते उस बँसवट से इक पीली-सी चिड़िया उसका कुछ अच्छा-सा नाम है ! मुझे पुकारे ! ताना मारे, भर आएँ, आँखड़ियाँ ! उन्मन, ये फागुन की शाम है ! घाट की …

उदास तुम

तुम कितनी सुन्दर लगती हो जब तुम हो जाती हो उदास ! ज्यों किसी गुलाबी दुनिया में सूने खँडहर के आसपास मदभरी चांदनी जगती हो ! मुँह पर ढँक लेती हो …

प्रार्थना की कड़ी

प्रार्थना की एक अनदेखी कड़ी बाँध देती है तुम्हारा मन, हमारा मन, फिर किसी अनजान आशीर्वाद में- डूबन मिलती मुझे राहत बड़ी ! प्रात सद्य:स्नात कन्धों पर बिखेरे केश आँसुओं …

तुम्हारे चरण

ये शरद के चाँद-से उजले धुले-से पाँव, मेरी गोद में ! ये लहर पर नाचते ताज़े कमल की छाँव, मेरी गोद में ! दो बड़े मासूम बादल, देवताओं से लगाते दाँव, …

विदा देती एक दुबली बाँह

विदा देती एक दुबली बाँह सी यह मेड़ अंधेरे में छूटते चुपचाप बूढ़े पेड़ ख़त्म होने को ना आएगी कभी क्या एक उजड़ी माँग सी यह धूल धूसर राह? …

क्या इनका कोई अर्थ नहीं

ये शामें, सब की शामें … जिनमें मैंने घबरा कर तुमको याद किया जिनमें प्यासी सीपी-सा भटका विकल हिया जाने किस आने वाले की प्रत्याशा में ये शामें क्या …

उत्तर नहीं हूँ

उत्तर नहीं हूँ मैं प्रश्न हूँ तुम्हारा ही !   नये-नये शब्दों में तुमने जो पूछा है बार-बार पर जिस पर सब के सब केवल निरुत्तर हैं प्रश्न हूँ तुम्हारा …

टूटा पहिया

मैं रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ लेकिन मुझे फेंको मत !   क्या जाने कब इस दुरूह चक्रव्यूह में अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर …

आँगन

बरसों के बाद उसीसूने- आँगन में जाकर चुपचाप खड़े होना रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना मन का कोना-कोना   कोने से फिर उन्हीं सिसकियों का उठना फिर आकर बाँहों …

नवम्बर की दोपहर

अपने हलके-फुलके उड़ते स्पर्शों से मुझको छू जाती है जार्जेट के पीले पल्ले-सी यह दोपहर नवम्बर की !   आयी गयी ऋतुएँ पर वर्षों से ऐसी दोपहर नहीं आयी जो …

सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु पर लिखी कविता

  दूर देश में किसी विदेशी गगन खंड के नीचे सोये होगे तुम किरनों के तीरों की शैय्या पर मानवता के तरुण रक्त से लिखा संदेशा पाकर मृत्यु देवताओं …

शाम: दो मनःस्थितियाँ

शाम: दो मनःस्थितियाँ एक: शाम है, मैं उदास हूँ शायद अजनबी लोग अभी कुछ आयें देखिए अनछुए हुए सम्पुट कौन मोती सहेजकर लायें कौन जाने कि लौटती बेला कौन-से …

क्योंकि

क्योंकि …… क्योंकि सपना है अभी भी – इसलिए तलवार टूटे, अश्व घायल कोहरे डूबी दिशायें, कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध-धूमिल, किन्तु कायम युद्ध का संकल्प …

समुद्र-स्वप्न

समुद्र-स्वप्न कनुप्रिया (अंश) जिस की शेषशय्या पर तुम्हारे साथ युगों-युगों तक क्रीड़ा की है आज उस समुद्र को मैंने स्वप्न में देखा कनु! लहरों के नीले अवगुण्ठन में जहाँ …