Category: अरुणा राय

प्यार में

प्‍यार में हम क्‍यों लड़ते हैं इतना बच्‍चों-सा जबकि बचपना छोड आए कितना पीछे अक्‍सर मैं छेड़ती हूँ उसे कि जाए बतियाए अपनी लालपरी से और झल्‍लाता-सा चीख़ता है …

पुकारने पर

पुकारने पर प्रति-उत्तर ना मिले तो बाहर नहीं भटकूँगी अब बल्कि लौटूँगी भीतर ही हृदयांधकार में बैठा जहाँ जल रह होगा तू वहीं तेरी मद्धिम आँच में बैठ गहूँगी …

दृश्‍य

तुम्‍हारी चाहना के तट पर छलक रहा समय है यह इसमें बहो और इसे बहने दो अपने भीतर गहने दो अपने अवगुंठनों को यह उघार डालेगा तुम्‍हें पोंछ डालेगा …

जीवन

अभी चलेगा , धूल-धुएँ के गुबार,… और भीड़-भरी सड़क, के शोर-शराबे के बीच जब चार हथेलियाँ मिलीं और दो जोड़ी आँखें चमकीं तो पेड़ के पीछे से छुपकर झाँकता …

कि अपनी हज़ार सूरतें निहार सकूँ

जिस समय मैं उसे अपना आईना बता रही थी दरक रहा था वह उसी वक़्त टुकड़ों में बिखर जाने को बेताब सा हालाँकि उसके ज़र्रे-ज़र्रे में मेरी ही रंगो-आब …

कि अपना ख़ुदा होना

ग़ुलामों की ज़ुबान नही होती सपने नही होते इश्क तो दूर जीने की बात नही होती मैं कैसे भूल जाऊँ अपनी ग़ुलामी कि अपना ख़ुदा होना कभी भूलता नहीं …

कहीं यही तो नहीं है प्यार

सोचती हूं अगली बार उसे देख लूंगी ठीक से निरख-परख लूंगी जान लूंगी पूरी तरह समझ लूंगी पर सामने आने पर निकल जाता है वक्त देखते-देखते कि देख ही …

उदासी

उदासी और हम आजू-बाजू बैठे थे ज्यादातर चुप कभी झटके से कुछ पूछते कि लगे नहीं कि उदासी है कि जैसे टोपी गिरी तो मैंने हंसते पूछा- अरे टोप …