Category: अरुणा राय

रिक्‍शा टुनटुनाता है

रिक्शा टुनटुनाता है मटियाले औ गुलाबी रंगों की है रौशनी सर पर इसमें डूबता उतराता वो भागा जाता है रिक्शा टुनटुनाता है क्षण को धूप उगती है क्षण को …

रचना

जब कोई बात मेरी समझ में आती है पर जिसे समझाना मुश्किल होता है तब शब्दों को उसके पारंपरिक अर्थों से अलग करते हुए एक जुदा अंदाज में सामने …

यूँ ही तो नहीं

भावप्रवण आखों वाले मेरे आत्ममुग्ध प्रिय ! तुम क्यों इस तरह बार-बार मुझसे विमुख हो जाते हो ? वह कौन सी मृगतृष्णा है जो भगाए लिए जा रही है, देखो मेरी …

यह बेकली ही हृदय की छाया है

कैसे बता सकती हूँ कि क्या होता है हृदय हालाँकि उसे दिखला देना चाहती हूँ सामने वाले को पर शब्द इसमें जरा सहायक नहीं होते बस मेरी आंखों में …

मौन का हाथ

पुकारने पर प्रति-उत्तर ना मिले तो बाहर नहीं भटकूंगी अब बल्कि लौटूंगी भीतर ही हृदयांधकार में बैठा जहाँ जल रह होगा तू वहीं तेरी मद्धिम आँच में बैठ गहूंगी …

मेरी रोशनी

कुछ प्रकाशवर्षों तक पहुँचती रहेगी मेरी रोशनी तुम तक तब भी जब नहीं रहेगा मेरा अस्तित्‍व उस रोशनी को ढूँढते जब पहुँचोगे मंजिल तक मैं बदल चुकी होऊँगी एक …

मेरा हृदय

उसकी निगाहें उसके चेहरे पर खिची स्मित-मुस्कान उसकी चंचलता मुझे स्थिर कर रही थी मेरी आँखें झुकी जा रही थीं और मेरा हृदय खोल रहा था ख़ुद को… मेरी …

मुझे पाने की हवस में

मुझे पाने की हवस में बेतरह चीख़ेगा वह बाहुपाश में ले त्रस्‍त कर देगा अंत में गड़ा डालेगा अपने बनैले दाँत मेरे हृदय प्रकोष्‍ठ में चूस जाएगा सारा रक्‍त …

प्‍यार में पसरता बाजार

सारे आत्मीय संबोधन कर चुके हम पर जाने क्यों चाहते हैं कि वह मेरा नाम संगमरमर पर खुदवाकर भेंट कर दे सबसे सफ्फाक और हौला स्पर्श दे चुके हम …

प्‍यार में पसरता बाजार

सारे आत्मीय संबोधन कर चुके हम पर जाने क्यों चाहते हैं कि वह मेरा नाम संगमरमर पर खुदवाकर भेंट कर दे सबसे सफ्फाक और हौला स्पर्श दे चुके हम …