Category: अंजना बख्शी

यासमीन

आठ वर्षीय यासमीन बुन रही है सूत वह नहीं जानती स्त्री देह का भूगोल ना ही अर्थशास्त्र, उसे मालूम नहीं छोटे-छोटे अणुओं से टूटकर परमाणु बनता है केमिस्ट्री में। …

मैं

मैं क़ैद हूँ औरत की परिभाषा में मैं क़ैद हूँ अपने ही बनाए रिश्तों और संबंधों के मकड़जाल में। मैं क़ैद हूँ कोख की बंद क्यारी में। मैं क़ैद …

बिटिया बड़ी हो गई

देख रही थी उस रोज़ बेटी को सजते-सँवरते शीशे में अपनी आकृति घंटों निहारते नयनों में आस का काजल लगाते, उसके दुपट्टे को बार-बार सरकते और फिर अपनी उलझी …

तस्लीमा के नाम एक कविता

टूटते हुए अक्सर तुम्हें पा लेने का एहसास कभी-कभी ख़ुद से लड़ते हुए अक्सर तुम्हें खो देने का एहसास या रिसते हुये ज़ख़्मों में अक्सर तुम्हे खोजने का एहसास …

क्यों ?

बच्चों की, चीख़ों से भरा निठारी का नाला चीख़ता है ख़ामोश चीख़ सड़ रहे थे जिसमें मांस के लोथड़े गल रही थी जिसमें हड्डियों की कतारें और दफ़्न थी …

कौन हो तुम

तंग गलियों से होकर गुज़रता है कोई आहिस्ता-आहिस्ता फटा लिबास ओढ़े कहता है कोई आहिस्ता-आहिस्ता पैरों में नहीं चप्पल उसके काँटों भरी सेज पर चलता है कोई आहिस्ता-आहिस्ता आँखें …

गुलाबी रंगों वाली वो देह

मेरे भीतर कई कमरे हैं हर कमरे में अलग-अलग सामान कहीं कुछ टूटा-फूटा तो कहीं सब कुछ नया! एकदम मुक्तिबोध की कविता-जैसा बस ख़ाली है तो इन कमरों की …

कराची से आती सदाएँ

रोती हैं मज़ारों पर लाहौरी माताएँ बाँट दी गई बेटियाँ हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की सरहदों पर अम्मी की निगाहें टिकी है हिन्दुस्तान की धरती पर, बीजी उड़िकती है राह …