Category: अमृता भारती

और मैं भी

मेरा अंधेरा खो गया था उसकी आँखों में और मैं भी- चलते-चलते उसके साथ क्षितिज की सुनहरी पगडंडी पर । श्वेत दृष्टि श्यामल हो उठी थी । मेरे होने, …

जब कोई क्षण टूटता

वह मेरी सर्वत्रता था मैं उसका एकान्त- इस तरह हम कहीं भी अन्यत्र नहीं थे । जब कोई क्षण टूटता वहाँ होता एक अनन्तकालीन बोध उसके समयान्तर होने का …

मैं उसकी आँच में अपने को जलाती हूँ

मैं उसकी आँच में अपने को जलाती हूँ। जलने के लिए अपनी राख को बार-बार कोयला बनाती हूँ। वह पर्वत के शिखर पर बैठा है पर्वत एक नीला आकाश …

मैं उसके पास उसे रख रही हूँ

मैं उसके पास उसे रख रही हूँ उसकी ही बातें उससे कर रही हूँ। मैंने अपनी सब बाहें फैला ली हैं उन पर दियों की पातें जला ली हैं …

मैंने सारे जगत की स्याही घोंट ली है

मैंने सारे जगत की स्याही घोंट ली है मैंने कालवृक्ष की टहनी तोड़ ली है उसका सद्यजात माथा नीचे झुकता है मेरी अनामिका का सर्पदंश सहता है

ऊँचे क़द वाले लोगों के लिए

ऊँचे कदवाले लोगों के लिए उसके बाहर एक सूचना है : ‘यहाँ केवल मिट्टी ही आती है सब अपने जूते बाहर ही उतार दो अन्दर लेकर आना मना है।’

लोग उसे सोना-चाँदी देते हैं

लोग उसे सोना-चांदी देते हैं : वह चुपचाप उनके भूबन्द कमरों में जाता है लोहे की दीवारों पर आकाश का छोटा-सा टुकड़ा चिपकाता है उसके पाँव डालने से सोने का …