Category: अलका सिन्हा

रंग डालें बासन्ती

अबकी ऐसे फाग मनाओ दीवारों पर रंग लगाओ रंग भरी भीगी दीवारें महक उठें सोंधी दीवारें नरम पड़ी गीले रंगों से जहाँ-तहाँ टूटें दीवारें । दीवारें घर के भीतर …

मधुमास

सुबह की चाय की तरह दिन की शुरुआत से ही होने लगती है तुम्हारी तलब स्वर का आरोह सात फेरों के मंत्र-सा उचरने लगता है तुम्हारा नाम ज़रूरी- गैरज़रूरी …

नये वर्ष की पहली कविता

नए वर्ष की पहली कविता का इंतज़ार करना जैसे उत्साह में भरकर सुबह-शाम नवजात शिशु के मसूढ़े पर दूध का पहला दाँत उँगली से टटोलना। मगर मायूस कर देते …

कचनार पर कविता

कितना अप्राकृतिक लगता है आज के समय में कचनार पर कविता लिखना । दौड़ती-भागती ज़िंदगी के बीच अल्प-विराम, अर्द्ध-विराम की तरह सड़क के किनारे आ खड़े होते हैं कितने …

अख़बार की ज़मीन पर

लिखी जा रही हैं कविताएँ अख़बार की ज़मीन पर । फड़फड़ा रहे हैं कहानियों के पन्ने पुस्तकालयों के रैक्स पर । खींसें निपोर रहे हैं श्रोता मंच के मसखरों …