Category: आकांक्षा पारे

मुक्ति पर्व

तुम हमारे परिवार के मुखिया हो तुम्हारा लाया हुआ धन मुहैया कराता है हमें अन्न। तुम हो तो हम नहीं कहलातीं हैं अनाथ रिश्तेदारों का आना-जाना त्योहारों पर पकवानों …

भरोसा

भरोसा बहुत ज़रूरी है इन्सान का इन्सान पर यदि इन्सान तोड़ता है यकीन तब इन्सान ही कायम करता है इसे दोबारा भरोसे ने ही जोड़ रखें हैं पड़ोस भरोसे …

बित्ते भर की चिंदी

पीले पड़ गए उन पन्नों पर सब लिखा है बिलकुल वैसा ही कागज़ की सलवटों के बीच बस मिट गए हैं कुछ शब्द। अस्पष्ट अक्षरों को पढ़ सकती हूं …

बदलती परिभाषा

बचपन में कहती थी माँ प्यार नहीं होता हँसी-खेल वह पनपता है दिल की गहराई में रोंपे गए उस बीज से जिस पर पड़ती है आत्मीयता की खाद होता …

तस्वीरें

कुछ न कह कर भी बहुत कुछ कह डालती हैं उनमें दिखाई नहीं पड़ती मन की उलझनें, चेहरे की लकीरें फिर भी वे सहेजी जाती हैं एक अविस्मरणीय दस्तावेज़ …

टुकड़ों में भलाई

हर जगह मचा है शोर ख़त्म हो गया है अच्छा आदमी रोज़ आती हैं ख़बरें अच्छे आदमी का साँचा बेच दिया है ईश्वर ने कबाड़ी को ‘अच्छे आदमी होते …

घर संभालती स्त्री

गुस्सा जब उबलने लगता है दिमाग में प्रेशर कुकर चढ़ा देती हूँ गैस पर भाप निकलने लगती है जब एक तेज़ आवाज़ के साथ ख़ुद-ब-ख़ुद शांत हो जाता है …

घर

सड़क किनारे तनी हैं सैकड़ों नीली, पीली पन्नियाँ ठिठुरती रात झुलसते दिन गीली ज़मीन टपकती छत के बावजूद गर्व से वे कहते हैं उन्हें घर उन घरों में हैं …

क्या करूंगी मैं

देहरी पर आती पीली धूप के ठीक बीच खड़े थे तुम प्रखर रश्मियों के बीच कोई न समझ सका था तुम्हारा प्रेम पूरे आंगन में, बिखरी पड़ी थी तुम्हारी …

औरत के शरीर में लोहा

औरत लेती है लोहा हर रोज़ सड़क पर, बस में और हर जगह पाए जाने वाले आशिकों से उसका मन हो जाता है लोहे का बचनी नहीं संवेदनाएँ बड़े …

एक टुकड़ा आसमान

लड़की के हिस्से में है खिड़की से दिखता आसमान का टुकड़ा खुली सड़क का मुँहाना एक व्यस्त चौराहा और दिन भर का लम्बा इन्तज़ार। खिड़की पर तने परदे के …

ईश्वर

ईश्वर, सड़क बुहारते भीखू से बचते हुए बिलकुल पवित्र पहुँचती हूं तुम्हारे मंदिर में ईश्वर जूठन साफ़ करती रामी के बेटे की नज़र न लगे इसलिए आँचल से ढक …

असफल प्रयास

तुम्हें भूलने की कोशिश के साथ लौटी हूँ इस बार मगर तुम्हारी यादें चली आई हैं सौंधी खुश्बू वाली मिट्टी साथ चली आती है जैसे तलवों में चिपक कर …

अनंत यात्रा

अपनी कहानियों में मैंने उतारा तुम्हारे चरित्र को उभार नहीं पाई उसमें तुम्हारा व्यक्तित्व। बांधना चाहा कविताओं में रूप तुम्हारा पर शब्दों के दायरे में न आ सका तुम्हारा …