Category: आकांक्षा रमन ‘स्म्रिति’

बहुत थक गई हू..

बहुत थक गई हु, अब चैन से सोना चहती हू…   मदमस्त इस उनमुक्त गगन मे, पन्छी सी उड जाना चहती हू… निश्चल लेहराती मछ्ली सी, गहरे पानी मे डूब जाना चहती हू…   बहुत थक गई हु, अब इस जिन्दगी से मुक्त होना चहती हू…   पेडो सी निष्पक्श छाया, सबको देना चहती हू… फूलो सी …