Category: आभा ‘आसिम’

ग़ज़ल

अब रौशनी की तलाश में कहाँ फिरा जाए मरने की फुरसतें हैं तो अब जी लिया जाए तुमसे मुहब्बत कर के बहुत परेशाँ रहा हूँ मैं इसी बात पे …

सहचर

जीवन के गतिमान पथों पर तुम साहस बनकर संग चलते हो। मैं बनकर मेघ बरसता हूँ, तुम अम्बर बनकर संग रहते हो। किसने जानी हैं कर्मों की सीमा? किसने …

लम्हे

इक रोज़ लम्हे हाथों से फिसल गए जैसे कभी अपने न थे जैसे उनमें कोई जिया न था वो जो ख़्वाब पलकों में थे आंसुओं में धुल चुके थे …

ओहदा (नज़्म)

ओहदों को नापो मत तौलो भी मत पेशा चाहे जो कोई हो ज़रा ज़रा सा फ़र्क मिलेगा कुछ कुर्सियों का काग़ज़ी हिसाबों का कुछ दहर-ए-शौक़ की मेहरबानी है कुछ …