Category: आभा बोधिसत्त्व

सीता नहीं मैं

तुम्हारे साथ वन-वन भटकूँगी कंद-मूल खाऊँगी सहूँगी वर्षा आतप सुख-दुख तुम्हारी कहाऊँगी पर सीता नहीं मैं धरती में नहीं समाऊँगी। तुम्हारे सब दुख सुख बाटूँगी अपना बटाऊँगी चलूँगी तेरे …

बहनें

बहनें होती हैं, अनबुझ पहेली-सी जिन्हें समझना या सुलझाना इतना आसान नही होता जितना लटों की तरह उलझी हुई दुनिया को , इन्हें समझते और सुलझाते …में विदा करने …

तुम्हारी कविता

तुम्हारी कविता से जानती हूँ तुम्हारे बारे में तुम सोचते क्या हो , कैसा बदलाव चाहते हो किस बात से होते हो आहत; किस बात से खुश तुम्हारा कोई …

स्त्रियाँ

स्त्रियाँ घरों में रह कर बदल रही हैं पदवियाँ पीढी दर पीढी स्त्रियाँ बना रही हैं उस्ताद फिर गुरु, अपने ही दो-चार बुझे-अनबुझे शव्दों से , दे रही हैं …