Category: आभा

लडकियाँ

घर-घर खेलती हैं लडकियाँ पतियों की सलामती के लिए रखती हैं व्रत दीवारों पर रचती हैं साझी और एक दिन साझी की तरह लडकियाँ भी सिरा दी जाती हैं …

मेरे आँसू

कभी कभी ऐसा क्यों लगता है कि सबकुछ निरर्थक है कि तमाम घरों में दुखों के अटूट रिश्ते पनपते हैं जहाँ मकडी भी अपना जाला नहीं बना पाती ये …

उस फूल का नाम

मेरी तकदीर पर वाहवाही लूटते हैं लोग पर अपने घ्रर में ही घूमती परछाई बनती जा रही मैं मैं ढूंढ रही पुरानी ख़ुशी पर मिलती हैं तोडती लहरें ख़ुद …

एक शब्‍द

शादी का लाल जोडा पहनाया था माँ ने उसकी रंगत ठीक ही थी पर उसमें टँके सितारे उसकी रंगत ढँक रहे थे मुझे दिखी नहीं वहाँ मेरी खुशियाँ मुझ …