Category: ज़ाकिर अली ‘रजनीश’

सुन लो नई कहानी

अब्बक–डब्बक टम्मक–टूँ नाचे गु‍डिया रानी। आसमान में छेद हो गया, बरसे झम–झम पानी। आओ लल्लू, आओ पलल्लू, सुन लो नई कहानी।। थोड़ा सा हम शोर मचाएँ, थोड़ा हल्ला–गुल्ला। हम …

यह बस्ते का भार

कब तक मैं ढ़ोऊँगा मम्मी, यह बस्ते का भार? मन करता है तितली के पीछे मैं दौड़ लगाऊँ। चिडियों वाले पंख लगाकर अम्बर में उड़ जाऊँ। साईकिल लेकर जा …

चुपके से बतलाना

बापू तुम्हें कहूँ मैं बाबा, या फिर बोलूँ नाना? सपनों में आ कर के मेरे चुपके से बतलाना।। छड़ी हाथ में लेकरके क्यों, सदा साथ हो चलते? दाँत आपके …

चलो चलें मधुबन में.

रवि का दर छूट गया, चंदा भी रूठ गया। कैसे प्रकाश करूँ, दीप न कोई बाती है। चलो चलें मधुबन में साधना बुलाती है।। हवाओं में शोर है, आँधी …

असह्य होती जा रही प्रतीक्षा

रूप तुम्हारा देखूँ मन में केवल इतनी इच्छा। टूट रहे हैं बाँध असह्य होती जा रही प्रतीक्षा। नयन राह पर लगे हुए हैं हटती नहीं निगाहें। कब तुमसे मिलवाएँगी …

याद तुम्हारी आती है

चंदा जब आँचल सरकाए, याद तुम्हारी आती है। कोयल जब पंचम में गाए, याद तुम्हारी आती है। रजनी का आँचल जब–जब खोकर अपनी स्याही को, ऊषा के रंग में …