Category: वैभव दुबे

ईद आ गई

गले मिलकर मिटा लो फासले ईद आ गई। मोहब्बत के शुरू हों सिलसिले ईद आ गई। नए ख्याल नई ख्वाहिश हसीं ख्वाब आँखों में खुशियों के सुहाने सफर पे …

जानूँ मैं।

हृदय छुपी इस प्रेम अग्नि में जलन है कितनी जानूँ मैं। मैं भटक रहा प्यासा इक सावन विरह वेदना जानूँ मैं। पर्वत,घाटी,अम्बर,नदिया जल सब नाम तुम्हारा लेते हैं। अम्बार …

तुम्हें पाना है नामुमकिन।

तुम्हें पाना है नामुमकिन फिर भी दिल ये कहे। जिन्दा तो हैं हम लेकिन बेजान बुत बन के रहे। ख्वाहिशें भी बिखर गईं जमीं पे आईने की तरह हाथ …

सब कहते हमें खाली।

सब कहते हमें खाली हम जमाना समेटे हैं। पैमाने क्या बुझाते प्यास हम मयखाना समेटे हैं। न सूरत देख ठुकराओ दिल में हैं प्यार की लहरें। समन्दर भी तो …

बुजुर्गों की दुआएं बिक गईं

जवानी की सत्ता में रिश्तों का बड़ा महंगा किराया हो गया। बचपन गोद में खेला है जिसके आज वो शख्स पराया हो गया। संस्कारों की जड़ें भी लोभ ने …

विजय का आशीर्वाद

मातृ दिवस पर कानपुर दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरी कहानी। मेरी परीक्षा का वक़्त नजदीक आ रहा था मैं पूरी तन्मयता से अपने अध्ययन के प्रति समर्पित था पर …

क्यूँ तिरस्कार मिलता है?

खिलते हुए फूल को बहुत प्यार मिलता है। जो गिर गए जमीं पे उन्हें तिरस्कार मिलता है। बड़ी मतलब परस्त है दुनिया जो जज्बातों से खेलती है। जिसके दर्द …

एक और किसान कुर्बान हुआ।

राजनीति की बेदी पर एक और किसान कुर्बान हुआ। ठुकराया जिसे धरती ने ,बेदर्द बहुत आसमान हुआ। सोचा था अब वक़्त आ गया दुःख सारे मिट जायेंगे मगर गीली …

माँ…..

माँ….कहने को एक छोटा सा शब्द मगर स्वयं में समेटे हुए समस्त ब्रम्हांड। जिसके चरणों में स्वर्ग हृदय मन्दिर और उसमें वास करते तैतींस करोड़ देवता। तनिक अभिमान नहीं …

मैं मज़दूर हूँ।

मैं मजदूर हूँ या मजबूर घृणित दृष्टि घूर रही जैसे अपराध किया हो संसार में आकर। मगर जब मध्यरात्रि में नींद को तिलांजलि देकर यात्रियों को गंतव्य तक पहुँचाता …

कभी मैं धूप बन जाऊं।

बदलता रूप बन जाऊं दया प्रतिरूप बन जाऊं। ठिठुरते जिस्म की खातिर कभी मैं धूप बन जाऊं। अमन बहुरूप बन जाऊं हंसू ,बहरूप बन जाऊं। प्यासे की प्यास बुझ …