Category: तुषार धवल

काला राक्षस-18

काले राक्षस देखो, तुम्हारे मुँह पर जो मक्खियों-से भिनभिनाते हैं हमारे सपने हैं वो जो पिटा हुआ आदमी अभी गिरा पड़ा है वही खडा होकर पुकारेगा बिखरी हुई भीड़ …

काला राक्षस-17

तुमने काली अंगुलियों से गिरह खोल दी काली रातों में उगती है पीड़ा उगती है आस्था भी जुड़वाँ बहनों सी तुम्हारे चाहे बगैर भी घर्र-घर्र घूमता है पहिया कितना …

काला राक्षस-16

मैं स्तंभ स्तंभ गिरता हूँ मैं खंड खंड उठता हूँ ये दीवारें अदृश्य कारावासों की आज़ादी ! आज़ादी !! आज़ादी !!! बम विस्फोट !!! कहाँ है आदमी ? प्रति मानव सब चले जा रहे …

काला राक्षस-15

कहाँ है आदमी ? यह नरमुंडों का देश है डार्विन की अगली सीढ़ी — प्रति मानव सबके चेहरे सपाट चिंतन की क्षमताएं क्षीण आखें सम्मोहित मूर्छा में तनी हुई दौड़ते …

काला राक्षस-14

पीड़ाओं का भूगोल अलग है लोक अलग जहाँ पिघल कर फिर मानव ही उगता है लिए अपनी आस्था। काला सम्मोहन — चेर्नोबिल। भोपाल। कालाहांडी। सोमालिया। विदर्भ। इराक। हिरोशिमा। गुजरात। …

काला राक्षस-13

सत्ताएं रंगरेज़ वाद सिद्धांत पूंजी आतंक सारे सियार नीले उस किनारे अब उपेक्षित देखता है मोहनदास और लौटने को है उसके लौटते निशानों पर कुछ दूब सी उग आती …

काला राक्षस-10

तुमने काली अंगुलियों से गिरह खोल दी काली रातों में निर्बंध पशु मैं भोग का नाख़ून गडा कर तुम्हारी देह पर लिखता हूँ प्यास और प्यास… भोग का अतृप्त …

काला राक्षस-9

प्यास यह अंतहीन सड़कों का अंतर्जाल खुले पशु के नथुने फड़कते हैं यह वो जंगल नहीं जिसे हमारे पूर्वज जानते थे अराजक भोग का दर्शनशास्त्र और जनश्रुतियों में सब …

काला राक्षस-8

इस धमन-भट्ठी में एक सन्नाटे से दूसरे में दाखिल होता हुआ बुझाता हूँ देह अजनबी रातों में परदे का चलन नोंचता हूँ गंध के बदन को यातना की आदमख़ोर …

काला राक्षस-6

तुमने काली अंगुलियों से गिरह खोल दी काली रातों में इच्छाएँ अनंत असंतोष हिंसक कहाँ है आदमी ? उत्तेजित शोर यह छूट-छिटक कर उड़ी इच्छाओं का गाता है हारी हुई …

काला राक्षस-5

एक छाया-सा चलता है मेरे साथ धीरे-धीरे और सघन फिर वाचाल बुदबुदाता है कान में हड़प कर मेरी देह जीवित सच-सा प्रति-सृष्टि कर मुझे निकल जाता है अब मैं …

काला राक्षस-4

घर्र घर्र घूमता है पहिया गुबार उठ रही है अंधकार में पीली-आसमानी उठ रही है पीड़ा-आस्था भी गड्डमड्ड आवाजों के बुलबुलों में फटता फूटता फोड़ा काल की देह पर …

काला राक्षस-1

समुद्र एक शून्य अंधकार-सा पसरा है। काले राक्षस के खुले जबड़ों से झाग उगल-उचक आती है दबे पाँव घेरता है काल इस रात में काली पॉलीथिन में बंद आकाश …