Category: तुलसीदास

हे हरि! कवन जतन भ्रम भागै

हे हरि! कवन जतन भ्रम भागै। देखत, सुनत, बिचारत यह मन, निज सुभाउ नहिं त्यागै॥१॥ भक्ति, ज्ञान वैराग्य सकल साधन यहि लागि उपाई। कोउ भल कहौ देउ कछु कोउ …

हरि को ललित बदन निहारु

हरि को ललित बदन निहारु! निपटही डाँटति निठुर ज्यों लकुट करतें डारु॥ मंजु अंजन सहित जल-कन चुक्त लोचन-चारु। स्याम सारस मग मनो ससि स्त्रवत सुधा-सिंगारु॥ सुभग उर,दधि बुंद सुंदर …

हरि! तुम बहुत अनुग्रह किन्हों

हरि! तुम बहुत अनुग्रह किन्हों। साधन-नाम बिबुध दुरलभ तनु, मोहि कृपा करि दीन्हों॥१॥ कोटिहुँ मुख कहि जात न प्रभुके, एक एक उपकार। तदपि नाथ कछु और माँगिहौं, दीजै परम …

हनुमान चालीसा

श्री गुरू चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि, बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि ॥1॥ बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार, बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, …

सुन मन मूढ

सुन मन मूढ सिखावन मेरो। हरिपद विमुख लह्यो न काहू सुख,सठ समुझ सबेरो॥ बिछुरे ससि रबि मन नैननि तें,पावत दुख बहुतेरो। भ्रमर स्यमित निसि दिवस गगन मँह,तहँ रिपु राहु …

सखि नीके कै निरखि कोऊ सुठि सुंदर बटोही

सखि नीके कै निरखि कोऊ सुठि सुंदर बटोही। मधुर मूरति मदनमोहन जोहन जोग, बदन सोभासदन देखिहौं मोही॥१॥ साँवरे गोरे किसोर, सुर-मुनि-चित्त-चोर उभय-अंतर एक नारि सोही। मनहुँ बारिद-बिधु बीच ललित …

सखि! रघुनाथ-रूप निहारु

सखि! रघुनाथ-रूप निहारु। सरद-बिधु रबि-सुवन मनसिज-मानभंजनिहारु॥ स्याम सुभग सरीर जनु मन-काम पूरनिहारु। चारु चंदन मनहुँ मरकत सिखर लसत निहारु॥ रुचिर उर उपबीत राजत, पदिक गजमनिहारु। मनहुँ सुरधनु नखत गन …

श्री रामचँद्र कृपालु भजु मन

श्री रामचँद्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणम्। नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर कंज, पद कंजारुणम्।। कंदर्प अगणित अमित छबि, नवनील-नीरद सुंदरम्। पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक-सुतानरम्।। भजु …

लाभ कहा मानुष-तनु पाये

लाभ कहा मानुष-तनु पाये। काय-बचन-मन सपनेहु कबहुँक घटत न काज पराये॥१॥ जो सुख सुरपुर नरक गेह बन आवत बिनहि बुलाये। तेहि सुख कहँ बहु जतन करत मन समुझत नहिं …

राम राम रटु, राम राम रटु

राम राम रटु, राम राम रटु, राम राम जपु जीहा। राम-नाम-नवनेह-मेहको, मन! हठि होहि पपीहा॥१॥ सब साधन-फल कूप सरित सर, सागर-सलिल निरासा। राम-नाम-रति-स्वाति सुधा सुभ-सीकर प्रेम-पियासा॥२॥ गरजि तरजि पाषान …

राम-पद-पदुम पराग परी

राम-पद-पदुम पराग परी। ऋषि तिय तुरत त्यागि पाहन-तनु छबिमय देह धरी॥१॥ प्रबल पाप पति-साप दुसह दव दारुन जरनि जरी। कृपा-सुधा सिंचि बिबुध बेलि ज्यों फिरि सुख-फरनि फरी॥२॥ निगम अगम …

राघौ गीध गोद करि लीन्हौ

राघौ गीध गोद करि लीन्हौ। नयन सरोज सनेह सलिल सुचि मनहुँ अरघ जल दीन्हौं॥ सुनहु लखन! खगपतिहि मिले बन मैं पितु-मरन न जान्यौ। सहि न सक्यो सो कठिन बिधाता …

रघुपति! भक्ति करत कठिनाई

रघुपति! भक्ति करत कठिनाई। कहत सुगम करनी अपार, जानै सोई जेहि बनि आई॥ जो जेहिं कला कुसलता कहँ, सोई सुलभ सदा सुखकारी॥ सफरी सनमुख जल प्रवाह, सुरसरी बहै गज …

यों मन कबहूँ तुमहिं न लाग्यो

यों मन कबहूँ तुमहिं न लाग्यो। ज्यों छल छाँड़ि सुभाव निरंतर रहत बिषय अनुराग्यो॥१॥ ज्यों चितई परनारि, सुने पातक-प्रपंच घर-घरके। त्यों न साधु, सुरसरि-तरंग-निर्मल गुनगुन रघुबरके॥२॥ ज्यों नासा सुगंध-रस-बस, …

यह बिनती रहुबीर गुसाईं

यह बिनती रहुबीर गुसाईं। और आस बिस्वास भरोसो, हरौ जीव-जड़ताई॥१॥ चहौं न सुगति, सुमति-संपति कछु रिधि सिधि बिपुल बड़ाई। हेतु-रहित अनुराग रामपद, बढ़ अनुदिन अधिकाई॥२॥ कुटिल करम लै जाइ …

मैं हरि, पतित पावन सुने

मैं हरि, पतित पावन सुने। मैं पतित, तुम पतित-पावन, दोउ बानक बने॥ ब्याध गनिक अगज अजामिल, साखि निगमनि भने। और अधम अनेक तारे, जात कापै गने॥ जानि नाम अजानि …

मैं केहि कहौ बिपति अति भारी

मैं केहि कहौ बिपति अति भारी। श्रीरघुबीर धीर हितकारी॥ मम ह्रदय भवन प्रभु तोरा। तहँ बसे आइ बहु चोरा॥ अति कठिन करहिं बर जोरा। मानहिं नहिं बिनय निहोरा॥ तम, …

मैं एक, अमित बटपारा

मैं एक, अमित बटपारा। कोउ सुनै न मोर पुकारा॥ भागेहु नहिं नाथ! उबारा। रघुनायक करहु सँभारा॥ कह तुलसिदास सुनु रामा। लूटहिं तसकर तव धामा॥ चिंता यह मोहिं अपारा। अपजस …

मेरो मन हरिजू! हठ न तजै

मेरो मन हरिजू! हठ न तजै। निसिदिन नाथ देउँ सिख बहु बिधि, करत सुभाउ निजै॥१॥ ज्यों जुबती अनुभवति प्रसव अति दारुन दुख उपजै। ह्वै अनुकूल बिसारि सूल सठ, पुनि …

मेरे रावरिये गति रघुपति है बलि जाउँ

मेरे रावरिये गति रघुपति है बलि जाउँ। निलज नीच निर्गुन निर्धन कहँ जग दूसरो न ठाकुन ठाउँ॥१॥ हैं घर-घर बहु भरे सुसाहिब, सूझत सबनि आपनो दाउँ। बानर-बंधु बिभीषन हित …

माधवजू मोसम मंद न कोऊ

माधवजू मोसम मंद न कोऊ। जद्यपि मीन पतंग हीनमति, मोहि नहिं पूजैं ओऊ॥१॥ रुचिर रूप-आहार-बस्य उन्ह, पावक लोह न जान्यो। देखत बिपति बिषय न तजत हौं ताते अधिक अयान्यो॥२॥ …

माधव, मोह-पास क्यों छूटै

माधव, मोह-पास क्यों छूटै। बाहर कोट उपाय करिय अभ्यंतर ग्रन्थि न छूटै॥१॥ घृतपूरन कराह अंतरगत ससि प्रतिबिम्ब दिखावै। ईंधन अनल लगाय कल्पसत औंटत नास न पावै व२॥ तरु-कोटर मँह …

माधव! मो समान जग माहीं

माधव! मो समान जग माहीं। सब बिधि हीन मलीन दीन अति बिषय कोउ नाहीं॥१॥ तुम सम हेतु रहित, कृपालु, आरतहित ईसहि त्यागी। मैं दुखसोक बिकल, कृपालु केहि कारन दया …