Category: तुफ़ैल चतुर्वेदी

सीधी-सादी शायरी को बेसबब उलझा दिया

सीधी-सादी शायरी को बेसबब उलझा लिया रात फिर हमने ग़ज़ल पर बहस में हिस्सा लिया हम कि नावाकिफ़ थे उर्दू ख़त से पर ग़ज़लें कहीं मोम की बैसाखियों से …

शह्र तारीक नज़र धुँधली, ख़राबा तारीक

शह्‍र तारीक, नज़र धुंधली, ख़राबा तारीक दिल था तारीक तो फिर होनी थी दुनिया तारीक मैं समझता था कि आँधी में जलेगा मेरा दीप कर गया मेरा मकां एक …

वो बिछड़ते वक्त होठों की हँसी लेता गया

वो बिछड़ते वक़्त होठों से हँसी लेता गया मुझमें साँसें छोड़ दीं, बस ज़िन्दगी लेता गया वो भी होठों पर लिये आया था दरिया अब की बार मैं भी …

वही रगों का टूटना वही बदन निढ़ाल माँ

वही रगों का टूटना वही बदन निढ़ाल माँ वही नज़र धुँआ-धुआँ तू फिर मुझे संभाल माँ मिलेगी तू जो अबके तो मुझे चहकता पायेगी मुझे भी आ गया है …

रात जागी न कोई चाँद न तारा जागा

रात जागी न कोई चाँद न तारा जागा उम्र भर साथ मैं अपने ही अकेला जागा क़त्ल से पहले ज़बाँ काट दी उसने मेरी मैं जो तड़पा तो न …

यादें हमलावर थीं कितनी रात उदासी तन्हा मैं

यादें हमलावर थीं कितनी- रात, उदासी, तन्हा मैं दिल तिल-तिल करके टूटा हर लम्हा खुद से जूझा मैं जाने किसको ढ़ूँढ़ रहा हूँ, जाने किसकी है ये खोज सूनी …

मैं खुद से रूशनासी का तरीका देखता हूँ

मैं खुद से रूशनासी का तरीक़ा देखता हूँ तेरी आँखों के आईने में चेहरा देखता हूँ परेशानी तुझे पाने में जाने कितनी होगी ख़यालों को भी अपने आबला-पा देखता …

महक रहे हैं फ़ज़ाओं में बेहिसाब से हम

महक रहे हैं फ़ज़ाओं में बेहिसाब से हम क़रीब आ के तेरे हो गये गुलाब से हम दिखाई दे न हमें और कुछ सिवा तेरे उठा रहे हैं, नजर …

महकते फूल से लम्हों की जौलानी पलट आयी

महकते फूल से लम्हों की जौलानी पलट आयी वो क्या लौटा कि घर में फिर फ़ज़ा धानी पलट आयी कुमुक सूरज की आने तक तुझे ही जूझना होगा चराग़े-शब …

भला लगा मुझे मैं उससे खुशगुमान जो था

भला लगा मुझे मैं उससे ख़ुशगुमान जो था वो बदमिज़ाज था, हर चन्द मेरी जान जो था तमाम उम्र कड़ी धूप थी, मैं बच ही गया किसी की याद …

बेचैनी पल-पल मुझे

बेचैनी पल-पल मुझमें कोई है घायल मुझमें मेरी ज़ंग है ख़्वाबों से खुद मेरा मक़तल मुझमें मुझमें मुझसे कौन ख़फ़ा रात और दिन हलचल मुझमें कोंपल-कोंपल रोता है इक …

बचे-बचे हुए फिरते हो क्यों उदासी से

बचे-बचे हुये फिरते हो क्यों उदासी से मिला-जुला भी करो उम्र-भर के साथी से ग़ज़ल की धूप कहाँ है, पनाह दे मुझको गुजर रहा हूँ ख़यालों की सर्द घाटी …

फूल खुश्बू चाँद सूरज रंग संदल लिख दिया

फूल, खुश्बू, चाँद, सूरज, रंग, संदल लिख दिया एक मिस्रे में तेरा परतौ मुकम्मल लिख दिया प्यास की कुछ ऐसी भी घड़ियाँ तेरी राहों में थीं बदहवासी के सबब …

फागुन से मेरे भी रिश्ते निकलेंगे

फागुन से मेरे भी रिश्ते निकलेंगे हां, सूखा हूं लेकिन पत्ते निकलेंगे रिश्तेदारों से उम्मीदें क्यों की थीं फ़जरी आमों में तो रेशे निकलेंगे बरसों की सच्चाई के ग़म …

धूप होते हुये बादल नहीं माँगा करते

धूप होते हुये बादल नहीं माँगा करते हमसे पागल तेरा आँचल नहीं माँगा करते हम फ़कीरों को ये कथरी, ये चटाई है बहुत हम कभी शाहों से मखमल नहीं …

दुआ किसी की भी ख़िदमतगुज़ार होती नहीं

दुआ किसीकी भी ख़िदमतगुज़ार होती नहीं किनारे बैठ के नद्दी तो पार होती नहीं ये मोजिज़ा तो हमारे ही बस में है प्यारे हवा दिये की कभी पहरेदार होती …

दाग़-धब्बे छोड़ कर अच्छा ही अच्छा देखना

दाग़-धब्बे छोड़ कर अच्छा ही अच्छा देखना जानते हैं हम भी आईने में चेहरा देखना सोच फिर छूने चली है उसके कदमों के निशां उँगलियों को फिर ख़यालों की …

तय तो हुआ साथ ही चलना, कहाँ चला

तय तो हुआ था साथ ही चलना, कहाँ चला कुछ तो बताता जा ये अकेला कहाँ चला तन्हाइयों के खौफ़ से भागा ख़ला१ की सम्त दिल ने कभी ठहर …

तज दे ज़मीन, पंख हटा, बादबान छोड़

तज दे ज़मीन, पंख हटा, बादबान छोड़ गर तू बग़ावती है, जमीं-आसमान छोड़ ये क्या कि पाँव-पाँव सफ़र मोतियों के सम्त हिम्मत के साथ बिफरे समंदर में जान छोड़ …

जो शायरी की तेरे अंग-अंग ऐसी थी

जो शायरी की तेरे अंग-अंग ऐसी थी ग़ज़ल की रात लहू में उमंग ऐसी थी अना१ के साथ खुला था महाज़२ सोचों का मुझे तो हार ही जाना था …

जिस जगह पत्थर लगे थे रंग नीला कर दिया

जिस जगह पत्थर लगे थे रंग नीला कर दिया अबकी रुत ने मेरा बासी जिस्म ताज़ा कर दिया आइने में अपनी सूरत भी न पहचानी गयी आँसुओं ने आँख …

छाँव की ख्वाहिश में यूँ मुझको मिला घर धूप का

छाँव की ख़्वाहिश में यूँ मुझको मिला घर धूप का मैं लिखा कर लाया हूँ जैसे मुकद्दर धूप का उसकी यादें जैसे सर पर बर्फ़ की चादर कोई हमने …

ग़ज़ल के शेरों की क़ीमत हँसी से माँगते हैं

ग़ज़ल के शेरों की क़ीमत हँसी से माँगते हैं वो खूँबहा भी मेरा अब मुझी से माँगते हैं इसीलिये तो कुचलती है रात-दिन दुनिया हम अपना हक़ भी बड़ी आजिज़ी से …

ग़ज़ल का सिलसिला था याद होगा

ग़ज़ल का सिलसिला था याद होगा वो जो इक ख़्वाब-सा था याद होगा बहारें-ही-बहारें नाचती थीं हमारा भी खुदा था याद होगा समन्दर के किनारे सीपियों से किसी ने …

खुशबुओं की किताब दे आया

खुशबुओं की किताब दे आया मैं उसे फिर गुलाब दे आया मुस्कुराना भी कितने काम का है उसकी आंखों को ख़्वाब दे आया सोचती थी भला करेगी मेरा ज़िंदगी …