Category: तारादत्त निर्विरोध

वृक्ष की नियति

उसने सूने-जंगलाती क्षेत्र में एक पौधा रोपा और हवाओं से कहा, इसे पनपने देना, जब विश्वास का मौसम आएगा यह विवेक के साथ विकसित होकर अपने पाँवों पर खडा …

बिम्ब कहाँ उतरेंगे

उजली रेखाओं के साँवरे चितेरे बिम्ब कहां उतरेंगे तेरे सम्मुख हैं दरपनी अँधेरे छाया-सी चल रही धूलिकण बुहारती सड़कों की भीड़ पाँवों से छूट रहीं सतहें जुड़ने को आ …

फूलों की पाठशाला

खुली पाठशाला फूलों की पुस्तक-कॉपी लिए हाथ में फूल धूप की बस में आए   कुर्ते में जँचते गुलाब तो टाई लटकाए पलाश हैं, चंपा चुस्त पज़ामें में है …

धूप की चिरैया

उड़ती है पार-द्वार धूप की चिरैया ।  पानी के दर्पण में, बिम्ब नया उभरा,  बिखर गया दूर-पास, एक-एक कतरा ।  पलकों-सी मार गई धूप की चिरैया ।  पूरब में …

थक गया हर शब्द

थक गया हर शब्द अपनी यात्रा में, आँकड़ों को जोड़ता दिन दफ़्तरों तक रह गया। मन किसी अंधे कुएँ में खोजने को जल काग़ज़ों में फिर गया दब, कलम …

झरते हैं फूल-पात

झरते हैं फूल-पात डाली से, गंधाते शूल हैं मौसम की गाली से एक नहीं गंध एक नहीं राग-रंग, सबके हैं खिलने के अलग-अलग ढंग वृक्षों के हालचाल पूछें क्यों …

जिदंगी

कभी एक पर्वत थी जिदंगी सूनी-अकेली-अबोली-सी, किसी ने छुआ फूल बन गई, किसी ने झटक दिया पाँखुरी-सी बिखर गई। तब जाना: न कभी वह फूल थी, न राई-पर्वत, एक …

चिट्ठी का भूगोल

मिस्टर आलू गोल-मटोल पढ़ने बैठे चिट्ठी खोल । देखे टेढ़े-मेढ़े अक्षर नाक सिकोड़ा, पीछे हँसकर । बोले, आना इधऱ विटोल देखो नक़्शा यह अनमोल । लगता है फिर पापाजी …

गौरव गान

कोटि-कोटि कंठों से गूँजे तेरा गौरव गान, जय जय भारत देश महान ।। ऊँचा पाल हिमालय तेरा, पाँव धो रहा सागर, गंगा-जमुना जैसी नदियाँ संगम करती आकर । पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण …

गोरी हथेली पर

ऊँची पहाड़ी पर खेल रहा बाल रवि कमसिन पहाड़िन की गोरी हथेली पर । घेर में किरणों के उछल रहा जैसे गोद ममता की लेने खिलौने को शिशु हो …

गंधाते शूल

झरते हैं फूल-पात डाली से गंधाते शूल हैं मौसम की गाली से एक नहीं गंध एक नहीं राग-रंग, सबके हैं खिलने के अलग-अलग ढंग वृक्षों के हालचाल पूछें क्यों …

खुली पाठशाला फूलों की

खुली पाठशाला फूलों की पुस्तक-कॉपी लिए हाथ में फूल धूप की बस में आए कुर्ते में जँचते गुलाब तो टाई लटकाए पलाश हैं, चंपा चुस्त पज़ामें में है हैट …

ऐसा दीप बनूँगा

जो सबको उजियारा बाँटे, ऐसा दीप बनूँगा अँधियारे का चोर न छिपकर उजियारे की गाँठ चुरा ले और न सबकी आँख चुराकर दुश्मन भी अधिकार जमा ले इसीलिए मैं …

एक लंबी देह वाला दिन

थक गया हर शब्द अपनी यात्रा में, आंकड़ों को जोड़ता दिन दफ्तरों तक रह गया। मन किसी अंधे कुएं में खोजने को जल कागज़ों में फिर गया दब, कलम …

अंधा कुंआं

चलो, अच्छा हुआ हमने भी झांक लिया लंगड़ों के गांव का अंधा कुंआं। अब तो हैं छूट रहे पांवों से पगडंडी-पाथ, वह भी सब छोड़ चले लाए जो साथ-साथ। …