Category: तारा सिंह

होली

मिटे धरा से ईर्ष्या, द्वेष, अनाचार, व्यभिचार जिंदा रहे जगत में, मानव के सुख हेतु प्रह्लाद का प्रतिरूप बन कर, प्रेम, प्रीति और प्यार बहती रहे, धरा पर नव …

सड़कें ख़ून से लाल हुईं

सड़कें ख़ून से लाल हुईं, हुआ कुछ भी नहीं इनसानियत शरम-सार हुई, हुआ कुछ भी नहीं हर तरफ़ बम के धमाके हैं, चीख है, आगजनी है मगर सितमगर को …

विरक्ति के भार से जिंदगी जब थक जाती है

जीवन की विरक्ति क बोझ ढोते – ढोते जब जिंदगी थक जाती है तब यही क्षोभ अंतरतम का ताप बनकर सदियों से जल रहे होम की ज्वाला – सा, …

रात काटती प्रहरी -सा

मेरे नयनों से पीड़ा छलकती, मदिरा -सी प्राणों से लिपटी रहती सुरभित चंदन -सी वह ज्वाल जिसे छूकर मेरा स्वप्न जला लगती सगही – सी , ढाल- ढालकर अंगारे …

यहाँ एक कण भी सजल आशा का नहीं

मनुज सोचता , हवा में जो झूल रहा स्वर्ग जलद जाल में उलझ रहे कुंतल – सा जीवन का ताप मिटाने कब उतरेगा,धरती पर कब टूटेगी वहाँ के सुधा …

मोहब्बत में अश्क़ की कीमत

मोहब्बत में अश्क़ की कीमत कभी कमती नहीं अँधेरे में रहकर भी रोशनी कभी मरती नहीं नज़रों का यह धोखा है, वरना कहीं आसमां से धरती कभी मिलती नहीं …

मैं काला तो हूँ, आप जितना

मैं काला तो हूँ, आप जितना उतना नहीं झूठा भी हूँ, आप जितना उतना नहीं हौसले भी बुलंद हैं मेरे, आसमां को छू लूँ, आप जितना उतना नहीं मैं …

मेरी आँखों में किरदार नजर आता है

मेरी आँखों में किरदार नजर आता है रँगे फलक यार का दीदार नजर आता है   पर्वत जैसी रात कटी कैसे पूछो मत आसमाँ फूलों का तरफदार नजर आता …

मुसलमान कहता मैं उसका हूँ

मुसलमान कहता मैं उसका हूँ हिन्दू कहता मैं उसका हूँ या ख़ुदा तुम बता क्यों नहीं देते आखिर हिस्सा मैं किसका हूँ फ़लक में फँसी है जान मेरी इन्सान …

मुझे मेरा गाँव याद आ गया

सुनते ही कागा की कर्त्तव्य पुकार दूर स्मृति के क्षितिज में चित्रित- सा हर्ष -शोक के बीते जहाँ वर्ष क्षण मेरा , मुझे मेरा वह गाँव याद आ गया …

फूलों को फूल ही रहने दें

बैठ गया है, मेरे दिल में बनकर कोई तांत्रिक जाने कौन अशुभ घड़ी थी, वह जो मैंने किया उसको आमंत्रित एक अनगढ़ा पत्थर – सा पड़ा हुआ था, सड़क …

प्रियतम बिन जीऊँ कैसे

मैं जिस प्रियतम को अपनी पलकों पर बिठाकर रखती आई, सयत्न आज आयेंगे वो, इसमें जरा भी नहीं वहम तन कुसुम विकसित होने लगा है लगता है, आ रहा …

परिधि–परिधि में घूमता हूँ मैं

निस्तब्धता से आती आवाज अब चली आओ तुम मेरे पास परिधि-परिधि में घूमता हूँ मैं गंध – गात्र में रहता हूँ मैं हवाओं की पटि उठाकर, जीर्ण का शीघ्र …

द्यूत क्रीड़ा-गृह है, सजा हुआ

दुनिया के इस द्यूत क्रीड़ा- गृह में मामा शकुनि के चतुर- पास में परम-पूज्य पितामह हैं मौजूद सिंहासन पर बैठी गांधारी सी सासें भी हैं, जो स्वयं बाँध रक्खी …

देव विभूति से मनुष्यत्व का यह

जिसके अभिवादनों की गूँज , सृष्टि के सहस्त्रों आननों की रूप -रेखाओं में गूँजते हैं जो स्वयं प्रकृति का समानान्तर , सुंदर है जो स्वयं खड़ा होकर निहारता और …