Category: सोनित बोपचे

चल अम्बर अम्बर हो लें..

चल अम्बर अम्बर हो लें.. धरती की छाती खोलें.. ख्वाबों के बीज निकालें.. इन उम्मीदों में बो लें.. सागर की सतही बोलो.. कब शांत रहा करती है.. हो नाव …

क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..

क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो.. क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो.. इस रिश्ते की बुनियाद हिलाने की शुरुआत तो मैंने की थी.. छुपकर तुमसे और किसी …

जश्न-ए-आजादी में “इन भारतीयों” को न भूलना…

यहाँ जिस्म ढकने की जद्दोजहद में… मरते हैं लाखों..कफ़न सीते सीते… जरा गौर से उनके चेहरों को देखो… हँसते हैं कैसे जहर पीते पीते… वो अपने हक से मुखातिब …

वक़्त

वक़्त को दीवार पर टांग रखा है और जब देखता हूँ शक्ल उसकी जैसे कोई बेबस.. तिलमिलाता हुआ लाख मजबूरियाँ..पर जिंदगी बसर करता फिर रात के सन्नाटों में आकर …

अब सिर्फ एक तागा टूटेगा..

आज उस पुराने झूले को देखकर कुछ बातें याद आ गयी.. कई बरस गुजरे जब वो नया था.. उसकी रस्सियाँ चमकदार थी.. उनमे आकर्षण था.. उन रस्सियों का हर …

मैं किनारा हूँ…लहरों सा मचलते रहिए…

किसी गुल सा मेरे गुलशन में भी खिलते रहिए… कभी दो चार दिन में हमसे भी मिलते रहिए… तेरि अटखेलियों का मैं भी इक दिवाना हूँ… मैं किनारा हूँ…लहरों …

क्यूँ दर्द की हर दास्तां रंगीन लगाती है…

वक़्त कैसा आ गया है, इस सफर में देखिये… जिंदगी हर मौत की शौकीन लगती है… तूने बनाई थी बड़ी हमदर्द ये दुनिया… संगदिल ये क्यूँ मुझे संगीन लगती …

रिश्तों की कमीज..

रिश्ते भी कमीज सरीखे होते हैं.. कुछ नए..कुछ पुराने..तो कुछ फटे हुए.. नए वाले अच्छे हैं चमक है उनमें पार्टी फंक्शन में पहनता हूँ कुछ रौब भी जम जाता …

और घर में बन्दर छोड़ चले..

तुम दिल क्यूँ मेरा तोड़ चले.. आँखों में समंदर छोड़ चले.. दिल को थी कहाँ उम्मीद-ए-वफ़ा.. यादों का बवंडर छोड़ चले.. 😐 न पूछो कैसा किया सितम.. जो दिल …

तुम्हारी याद आती है..

हवाएँ मुस्कुराकर जब घटाओं को बुलाती है.. शजर मदहोश होते हैं..तुम्हारी याद आती है.. इन्ही आँखों का पानी फिर उतर आता है होठों तक.. भिगोकर होंठ कहता है..तुम्हारी याद …

ये वो कली है जो अब मुरझाने लगी है..

कश्ती समंदर को ठुकराने लगी है.. तुमसे भी बगावत की बू आने लगी है.. मत पूछिए क्या शहर में चर्चा है इन दिनों.. मुर्दों की शक्ल फिर से मुस्कुराने …

खुदा प्यारा ज़माने को..मुझे बस बंदगी प्यारी…

तुम्हारी याद में हर पल हरिक लम्हा जिया हूँ मै… इसी तरह बिता दी इस बशर ने जिन्दगी सारी… न पूछो क्या मोहब्बत का हुआ मुझपे असर यारों… खुदा …

मैं रोज नशा करता हूँ… गम रोज गलत होता है…

इक हाथ सम्हलती बोतल… दूजे में ख़त होता है… मैं रोज नशा करता हूँ… गम रोज गलत होता है… तरकश पे तीर चड़ाकर… बेचूक निशाना साधूँ… उस वक्त गुजरना …

असमान आर्थिक वितरण..गरीबी..विडम्बना..(कविता)

खा खा के मर गए कुछ..खाने को मर रहे हैं.. कुछ मर रहे हैं क्यूंकि खाने को कुछ नहीं है.. इस जिन्दगी में जीने को है कई बहाने.. माना …