Category: सोहन लाल दिवेदी

प्रकृति-सन्देश

प्रकृति-सन्देश पर्वत कहता शीश उठाकर, तुम भी ऊँचे बन जाओ। सागर कहता है लहराकर, मन में गहराई लाओ। समझ रहे हो क्या कहती हैं उठ-उठ गिर-गिर तरल तरंग भर …

नयनों की रेशम डोरी

नयनों की रेशम डोरी से अपनी कोमल बरज़ोरी से। रहने दो इसको निर्जन में बाँधो मत मधुमय बन्धन में, एकाकी ही है भला यहाँ, निठुराई की झकझोरी से। अन्तरतम …

गिरिराज

यह है भारत का शुभ्र मुकुट यह है भारत का उच्च भाल, सामने अचल जो खड़ा हुआ हिमगिरि विशाल, गिरिवर विशाल! कितना उज्ज्वल, कितना शीतल कितना सुन्दर इसका स्वरूप? …

कौन?

किसने बटन हमारे कुतरे? किसने स्‍याही को बिखराया? कौन चट कर गया दुबक कर घर-भर में अनाज बिखराया? दोना खाली रखा रह गया कौन ले गया उठा मिठाई? दो …

कबूतर

कबूतर भोले-भाले बहुत कबूतर मैंने पाले बहुत कबूतर ढंग ढंग के बहुत कबूतर रंग रंग के बहुत कबूतर कुछ उजले कुछ लाल कबूतर चलते छम छम चाल कबूतर कुछ …

ओस

हरी घास पर बिखेर दी हैं ये किसने मोती की लड़ियाँ? कौन रात में गूँथ गया है ये उज्‍ज्‍वल हीरों की करियाँ? जुगनू से जगमग जगमग ये कौन चमकते …

एक किरण आई छाई

एक किरण आई छाई, दुनिया में ज्योति निराली रंगी सुनहरे रंग में पत्ती-पत्ती डाली डाली एक किरण आई लाई, पूरब में सुखद सवेरा हुई दिशाएं लाल लाल हो गया …