Category: शिवदत्त श्रोत्रिय

क्या सचमुच शहर छोड़ दिया

अपने शहर से दूर हूँ, पर कभी-२ जब घर वापस जाता हूँ तो बहाना बनाकर तेरी गली से गुज़रता हूँ मै रुक जाता हूँ उसी पुराने जर्जर खंबे के …

अगर भगवान तुम हमको, कही लड़की बना देते

अगर भगवान तुम हमको, कही लड़की बना देते जहाँ वालों को हम अपने, इशारो पर नाचा देते|| पहनते पाव मे सेंडल, लगते आँख मे काजल बनाते राहगीरो को, नज़र …

फ़ौज़ी का खत प्रेमिका के नाम

कितनी शांत सफेद पड़ी चहु ओर बर्फ की है चादर जैसे कि स्वभाव तुम्हारा करता है अपनो का आदर|| जिस हिम-शृंखला पर बैठा कितनी सुंदर ये जननी है| बहुत …

मैने तुम पर गीत लिखा है

एक नही सौ-२ है रिस्ते है रिस्तो की दुनियादारी, कौन है अपना कौन पराया जंजीरे लगती है सारी तोड़के दुनिया के सब बंधन तुमको अपना मीत लिखा है|| मैने …

क्यो कहते हो मुझे दूसरी औरत

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय मै गुमनाम रही, कभी बदनाम रही मुझसे हमेशा रूठी रही शोहरत, तुम्हारी पहली पसंद थी मै फिर क्यो कहते हो मुझे दूसरी औरत || ज़ुबान से …

हम बनाएँगे अपना घर

होगा नया कोई रास्ता होगी नयी कोई डगर छोड़ अपनी राह तुम चली आना सीधी इधर|| मार्ग को ना खोजना ना सोचना गंतव्य किधर मंज़िल वही बन जाएगी साथ …

तेरे शहर मे गुज़ारी थी मैने एक जिंदगी

तेरे शहर मे गुज़ारी थी मैने एक जिंदगी पर कैसे कह दूं हमारी थी एक जिंदगी || जमाने से जहाँ मेने कई जंग जीत ली वही मोहब्बत से हारी …

कारवाँ गुजर गया

कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे कत्ल करने वाले, अख़बार देखते रहे| तेरी रूह को चाहा, वो बस मै था जिस्म की नुमाइश, हज़ार देखते रहे|| मैने जिस काम …

अब शृंगार रहने दो

अब शृंगार रहने दो कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय जैसी हो वैसी चली आओ अब शृंगार रहने दो| अगर माँग हे सीधी या फिर जुल्फे है उल्झी ना करो जतन इतना …