Category: शिशिर कुमार गोयल

जिम्मेदारी – शिशिर मधुकर

अमृतसर में उजडा दशहरे का मेला कैसा ये खेल देखो कुदरत नें खेला नज़र सावधानी से थोड़ी जो हट गई रेल कीं पटरी फिर लाशों से पट गई देखी …

ये एहसान तेरा है – शिशिर मधुकर

कहाँ जाएं मिलें किस से बड़ी मुश्किल ने घेरा है मुझे अपनों नें क्या लूटा कोई दिखता ना मेरा है मुझे रिश्तों में जकडा है मगर ना प्यार बरसाया …

मिला ना वो मगर अब तक – शिशिर मधुकर

मुहब्बत जिस को होती है वो तो नज़दीक आता है खुद की हस्ती को साथी के लिए जड़ से मिटाता है जो रिश्ता निभाता है फ़कत एक आस के …

सैलाब की नीयत – शिशिर मधुकर

मैं तन्हा हूँ राह साथी की जाने कब से तकता हूँ फना होती हैं उम्मीदें ग़म का मारा सा थकता हूँ मेरी आँखों में आंसू तो नज़र ना आएंगे …

टूटने की भी सीमा है – शिशिर मधुकर

मन की बात खुलकर के जहाँ पे कह नहीं सकते ऐसे हालातों में इंसान कभी खुश रह नहीं सकते तेरे नज़दीक आते हैं तो फ़कत रुसवा ही होते हैं …

अगर दिल खूबसूरत है – शिशिर मधुकर

अगर दिल खूबसूरत है नज़र चेहरे पे आता है कोई मुखड़ा मुझे हरदम तभी इतना लुभाता है मुहब्बत वो नहीं समझा उम्र गुजरी है पर सारी साथ एक ऐसे …

अभी उम्मीद बाकी है – शिशिर मधुकर

वो मेरे साथ रहता है मगर फिर भी ना मेरा है फ़कत तन्हाइयों नें ज़िन्दगी में मुझको घेरा है बड़ी लम्बी हुईं है रात इस जीवन के मेले की …

कातिल ये बहरे हैं – शिशिर मधुकर

भुला दो तुम मुझे चारों तरफ़ बैरी के पहरे हैं रोशनी अब नहीं दिखती अंधेरे इतने गहरे हैं संभालो मत ना उठने दो तूफां को समुन्दर में लील जाएंगे …

जी भर के इठलाती हूँ – शिशिर मधुकर

जब जब तुम पर मैं अपने अधिकारों को जतलाती हूँ तुम मेरे हो सब लोगों को इस सच को ही बतलाती हूँ मेरी बचकाना बातों पे जब भी तुम …

मुलाकातें – शिशिर मधुकर

मुलाकातें बड़ी मुद्दत से अपनी हो ना पाई हैं तेरी राहें सदा तकती ये आँखें सो ना पाई हैं बड़ा तूफान आया था और बरखा हुईं जमकर निशां अपनी …

तुमको ख़बर होगी – शिशिर मधुकर

मेरी नज़रों से खुद को देख लो तुमको ख़बर होगी ये मेरी ज़िंदगी तेरे जलवों के बिन कैसे बसर होगी तेरी अपनी मुसीबत है ये सच स्वीकार है मुझको …

बारिश हुई जब प्रेम की – शिशिर मधुकर

सोचे बिना ये इश्क मैंने तुमसे जो कर लिया अपने वीरान सपनों को तेरे रंग से भर लिया कोई नहीं है ऊँच नीच अब तेरे मेरे दरम्यान तेरी हर …

मुहब्बत में वो ताकत है – शिशिर मधुकर

सुबह उठते ही जो मुझको तुम्हारी दीद मिल जाए मेरे मन के भीतर की हर कली फिर तो खिल जाए तू अपने मरमरी हाथों से मेरी जुल्फों को सहला …

जब भी तुम मिले – शिशिर मधुकर

राहों में जब भी तुम मिले यादें पुरानी आ गईं ऐसा लगा अम्बर में ज्यों काली घटाएँ छा गईं ये गुमां मुझ को हुआ कि तुम मेरे नज़दीक थे …

जालिम हुई है ज़िंदगी – शिशिर मधुकर

अधूरी पड़ी है ज़िंदगी ना चैन आता है कोई कहीं ख्वाबों में मुझको बुलाता है साथ जन्मों का तो हरदम टीस देता है तुम भुलाओ ये मगर फिर भी …

गज़ल तुमको क्या समझाऊं – शिशिर मधुकर

ग़ज़ल तुमको क्या समझाऊं मैं तो जज्बात कहता हूँ मुहब्बत जिसने भी दी मुझको उन्हीं के साथ रहता हूँ सोच शब्दों में आती है कलम फिर चलती ही जाती …