Category: संजीव आर्या

मैं दिखता हूँ जो आँखों में तो लब से क्यूँ नहीं कहते

मैं दिखता हूँ जो आँखों में तो लब से क्यूँ नहीं कहते मुझे कहते हो तुम अपना तो सब से क्यूँ नहीं कहते लब-ए-खामोश से ही बस दलील-ए-इश्क देते …

पनाहे दे रहें हैं सब , रिहाई हमने मांगी हैं

पनाहे दे रहें हैं सब , रिहाई हमने मांगी हैं गुनाह-ए-इश्क में सोकर ये आँखें रात जागी हैं जो तर्क-ए-इश्क करना है थोड़ी तोहमत लगा देना मेरे सजदों में …

पलक का ये इशारा है इन आँखों में आब न देखूँ

पलक का ये इशारा है इन आँखों में आब न देखूँ के आँखों से तो सब देखूँ मगर कोई ख्वाब न देखूँ निगाह-ए-शौक को तन्हा करूँ जो अब न …

माही

क्यूँ स्वप्न सलोने जगते हैं ये जब नन्ही परियाँ सो गयी हैं तन व्याकुल सा समय क्या देखे अब मन की घड़ियाँ खो गयी हैं नीरवता में बस चीख …

कोई जब हाथ ये देखे मैं तेरा हूँ निकल आये

कोई जब हाथ ये देखे मैं तेरा हूँ निकल आये नमी भी हो चले रुखसत चश्म से खूँ निकल आये तुम्हारी याद से निकलूँ किसी कागज पे कुछ लिखकर …

उतर आया जो आँखों में तुम्हारा ही तो किस्सा हूँ

उतर आया जो आँखों में तुम्हारा ही तो किस्सा हूँ दबा कर होठ ही कह दो तुम्हारा ही तो हिस्सा हूँ मुझे अपने तसव्वुर में कहीं तुम कैद अब …

अँधेरी रातों में भी उजाले थे

अँधेरी रातों में भी उजाले थे तुम ही थे जो मेरा मन संभाले थे मेरी आवाज़ में जो लय आई है तुम्हारे शब्दों से सुर निकाले थे -संजीव आर्या

अश्क, यादें , तन्हाइयाँ ये तो सब इनाम है

अश्क, यादें , तन्हाइयाँ ये तो सब इनाम है प्यार के बाजार में अब जिस्म का ही नाम है शहर जब दवा करे तो ज़ख्म और दुखने लगे कोई …

अभी सदाएं उसे न देना, अभी वो राह से गुजर रहा है

अभी सदाएं उसे न देना ,अभी वो राह से गुज़र रहा है कदम हसीं वो जहाँ भी रखे , वहीँ ज़माना ठहर रहा है अगर जान लेले तो गम …

जिस्म सलामत लेकिन अपनी रूह को घायल कहता हूँ

जिस्म सलामत लेकिन अपनी रूह को घायल कहता हूँ सन्नाटो का शोर सुनूं तो खुद को पागल कहता हूँ जब हर्फ़ तुम्हारे भीगे खत में नैन को बादल कहता …

गम-ए-दिल आज फिर अश्कों में नहाने निकले

गम-ए-दिल आज फिर अश्कों में नहाने निकले तुम्हे भूलसे भी न भूल पाने के सौ बहाने निकले हमारे पास खुद का एक लम्हा भी नहीं निकला तुम्हारे पास तो …