Category: रिंकी राउत

प्रेम में मिलावट

प्रेम शुद्ध कांच सा निर्मल था जब पेहली बार बचपन और यौवन के बीच हुआ धीरे-धीरे,जैसे-जैसे प्रेम को समझने की कोशिश की प्रेम में मिलावट घुलता गया प्रेम मिलावटी …

सरहद

जमीन पर एक लकीर खीची इन्सान चले अपने-अपने ओर एक ने कहा पाक जमीन दुसरे ने कहा भारत महान बैर दोनों ने पाला कुछ खास लोगो ने कभी नफरत …

लत

पीने से कोई सवाल हल नहीं होता और ना पीने से भी मेरा कोई सवाल हल नहीं हुआ पीते-पीते मैं पूरी रात पी गया रात का खोखलापन, शराब का …

किताबे

मेरे सिरहाने रहकर भी मुझसे रूठी है किताबे कुछ टेबल पर,कुछ पलंग नीचे जा छुपी आधी पढ़ी, आधी बाकी कोने में रखी किताबे हमेश पढ़ी जाने के इंतजार में …

आतंकवाद

कही किसी ने धर्म पर अपनी राय दी मानवता की मर्यादा को तोड़ता हुआ असंवेदनशील टिप्पणी कही किसी ने खेल खेला ऐसा शतरंज का खेल जिसे खेलता कोई है …

दर्द

गुलज़ार कहते है खुशी फूलझड़ी सी होती है रोशनी बिखरती झट से खत्म हो जाती है दर्द देर तक महकता है भीतर ही भीतर सुलगता है उसकी खुशबू जेहन …

रावण मरता क्यों नहीं?

बार-बार जलाने के बाद भी रावण साल दर साल विशालकाय और विकराल रूप धारण करता रहा ना रावण को जलानेवाला हारे ना ही रावण हारा सिलसिला सदियों तक चलता …

शरणार्थी

लेटा था मैं समुंद्र किनारे लोग दौड़े-दौड़े आए मर गया ये तो.. किसी ने कहा कितना सुन्दर बच्चा था.. दुसरे ने कहा मैं शांत लेटा रहा समुंद किनारे शरणार्थी …

खत्म

सूरज की गरम रोशनी हवा का अपनापन फूलो की खुशबू का साथ सब पहले जैसा है कुछ तो खत्म नहीं हुआ बिखरे सपनों की आंच सूखे कुएं सी प्यास …

परछाई

बादल के परछाई के पीछे चल दिए नंगे पैर, टूटी,बिखरी उम्मीद लिए चल पड़ी बेखबर सी झूठे सपनो को लिए बादल जिसका पीछा किया खेलता आंख मिचोली जा छुपता …