Category: आरसी प्रसाद सिंह

कवि-श्री

आया बन जग में प्रातः रविः मैं भारत-भाग्य विधाता कवि ! तोड़ता अलस जग-जाल जटिल; सुकुमार, स्नेह-धारा-उर्म्मिल ! मैं पुरुष-पुरातन, प्रेम-दान; चिर-कविर्मनीषी, सृष्टि-प्रान !! बरसाती लौह-लेखनी पवि; मैं विद्रोही इठलाता कवि ! सुर-तरु-सा …

निर्वास

कैसे अलि, भाया यह उपवन ? वैभव-समाधि पर ऋतुपति की यह पतझड़ का सैकत-नर्तन ! तू नंदन-वन की मोहमयी सुंदरी परी शोभाशाली; तेरी चितवन से किस प्रकार मदिराकुल होता वनमाली ! रोता …

स्वागत

स्वागत, मुदमंगलमय सहर्ष हे नूतन ऋतु, हे नवल वर्ष ! बिखरे चरणों पर मुक्तमाल, यह शरत्सुंदरी की प्रसन्न दल-दल पर दूर्वादल-प्रवाल ! आनन श्री छायापथ प्रपन्न फैला जो नव रवि-रश्मि-जाल, आली …

चिड़िया

पीपल की ऊँची डाली पर बैठी चिड़िया गाती है । तुम्हें ज्ञात अपनी बोली में क्या संदेश सुनाती है ? चिड़िया बैठी प्रेम-प्रीति की रीति हमें सिखलाती है । वह …

तुम्हारी प्रेम-वीणा का अछूता तार

तुम्हारी प्रेम-वीणा का अछूता तार मैं भी हूँ मुझे क्यों भूलते वादक विकल झंकार मैं भी हूँ मुझे क्या स्थान-जीवन देवता होगा न चरणों में तुम्हारे द्वार पर विस्मृत …

नए जीवन का गीत

मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया। चकाचौंध से भरी चमक का जादू तड़ित-समान दे दिया। मेरे नयन सहेंगे कैसे यह अमिताभा, ऐसी ज्वाला? मरुमाया की …