Category: रवीन्द्र प्रभात

पहली बार स्तब्ध नहीं हुयी है हवाएँ

हमारे साथ- पहली बार स्तब्ध नहीं हुयी है हवाएँ पहली बार भावुक नहीं हुआ है पूरा देश पहली बार विवश नहीं दिखा है आम-आदमी पहली बार- हमारे चलने-फिरने-बोलने पर …

वह चुटकियों में हल निकाल देता है

वह चुटकियों में हल निकाल देता है चालाक है, कीचड़ उछाल देता है । घुप्प अंधेरा हर तरफ कायम रहे – आवरण सूरज पे डाल देता है । बात …

जज़्बात पर हावी यकीनन धाक हो गयी है

गजल  जज़्बात पर हावी यकीनन धाक हो गयी है दिल्ली की सल्तनत बड़ी नापाक हो गयी है । नुमाइंदे आवाम के बसते हैं जिस शहर में- इज्जत-हिफाजत उस शहर …

तुम्हारा जिंदा रहना जरूरी है गुल मकई !

“अपने हक़ और हकूक की हिफाजत में – क्यों भूल गयी मजहबी कायदे-कानून ? कच्ची उम्र मे- खिलौनों और गुड़ियों की ज़िद करने के बजाय चटर पटर मुंहफट क्यों …

उसी प्रकार जैसे ख़त्म हो गयी समाज से सादगी….

बहुत पहले- लिखे जाते थे मौसमो के गीत जब रची जाती थी प्रणय कीकथाऔर – कविगण करते थे देश-काल की घटनाओं पर चर्चा तब कविताओं मेंढका होता था युवतियों का …

जब बीमार होता कोई मजदूर

जब बीमार होता कोई सेठ जरूरत महसूस नही होती ओझा- गुणी की नीम-हकीम से भी ठीक नही होते सेठ दुआएं नही भाती उसे अपने मजदूरों की दिए जाते कोरामीन / …

प्रेम तकलीफदेह है ….

जहां समाप्ति की नियति है वहां हर कर्म क्षणिक और अपने लिए गढ़ा गया हर अभिप्राय भ्रम होता है इसलिए- शुरू की जानी चाहिए मृत्यु से जीवन की बात …

किसकी रोएं, किसकी गाएं बाबू जी ।

(ग़ज़ल ) पटाखे फोड़कर क्यूं नोट जलाएं बाबू जी मिटटी के दीयों से घर सजाएं बाबू जी । . हमारे गाँव की पगडंडियाँ मासूम है- इसे न राजपथ से …

मैं बारिश और बयार है वह ।

(ग़ज़ल ) बड़ा ज़िद्दी बड़ा निडर बड़ा खुद्दार है वह इसलिए शायद अलग-थलग इसपार है वह । रात को दिन और दिन को रात कैसे कहे- यार जब राजनेता …

मेरा बाजू वाला घर

खामोशियों के आलिंगन में आबद्ध वह गुब्बारा सुबह से तैरता हुआ अचानक फूट पड़ता है, तब – जब हमारे आँगन में उतरता है रात का अन्धेरा चुपके से । …

कहाँ गए नलकूप

दोहे  पहले ओला गिर गया, गडमड पैदावार ! कैसी गर्मी बेशरम,     आयी है इसबार !!  . झुरमुट-झुरमुट झांकता, रात में नन्हा चाँद ! पर ज्यों-ज्यों दिन चढ़ …

बन रही तल्खियाँ , बेटियाँ ।

ग़ज़ल   बेटियाँ , बेटियाँ , बेटियाँ बन रही तल्खियाँ , बेटियाँ । सुन के अभ्यस्त होती रही, रात – दिन गलियाँ , बेटियाँ । सच तो ये है …

तुम लौट आना अपने गांव

कविता जब झूमें घटा घनघोर और टूटकर बरस जाये तुम लौट आना अपने गांव अलाप लेते हुये धानरोपनी गीतों का कि थ्रेसर – ट्रेक्टर के पीछे खडे बैल तुम्हारा …

आज फिर…

कविता  आज फिर- धर्ममद का अग्निकांड दरका गया छाती और लोगों की फूहड़ गालियों से निस्तब्ध हो गयी परिस्थितियाँ ! . आज फिर – उद्घाटित हुई सदाचार की नयी …

छेडिए इक जंग…

ग़ज़ल  खेलिए ज़ज़्बात से मत खौफ़ तारी कीजिये मुस्करा के वेबजह ना  मेहरबानी  कीजिये . छेडिये इक जंग ग़ुरबत को मिटाने के लिए घोषणा मत खोखली या मुँह जबानी कीजिये . कौन है …