Category: राकेश कुमार

दूर करके

हे मुरलीधर,हे मनोहर मेरे अधर तुझे बुलाते हैं कचोट रहे कलयुग में मुझको जो तेरा मज़ाक उड़ाते हैं हे चितचोर ,बांके बिहारी चोरी का इल्जाम लगाते हैं ये अंधे …

रहता है वहां एक

बहुत थोड़ा है मेरा सामान देखिए जेबों में पड़े अरमान देखिए कूबत न हो बेशक इबादत की टूटता नहीं मेरा ईमान देखिए दिल को दुखाकर मुस्काता मैं नहीं दुखों …

रगड़ रगड़कर घिस घिसकर अपना हर जज्बात बने भला करूंगा क्या पढ़ लिखकर जब तक ना हालात बने जेहन को जमीर से जोड़े हो कुछ ऐसे सवालात खड़े भटक …

जाने ये जमाना मुझे क्या से क्या बनाता गया

कहानी आकर उसी फलसफे पर रूक गई जहाँ थककर कलम अपनी जबरन मै उठाता गया हसरत थी की सो जाऊं रखकर किसी कंधे पर सर यूँ रात रात भर …

नारी जहां पूजते है

मै मुस्कुराना चाहती हूँ पर लोग ताकने लगते है दबी दबी हशती हूँ तो लोग टोकने लगते है आश्मानो से ऊँचा उड़ना चाहती हूँ बन्द कमरो मे लोग खरोचने …

चित्तचोरनी

अल्हड विधिवत मनमोहिनी निश्छल चन्द्र मुख शोभिनी पुलकित पुष्प इत्र भोगिनी नाजुक पठित निर्मम शोहिनी उज्जवल अधर मदमस्त मृगिनी हर्षित चित्त काजल रोहिणी नभ नैन निर्मल मन मोहक रूपा …

ईमानदारी की पोटली

सरकारी बाबूजी दफ्तर के कोने में डेरा जमाता है मोटा पहनता है चश्मा गाल में पान दबाता है कभी फाइल मिली नहीं मेरी कभी पर्ची मुझे पकड़ाता है कभी …

बेटी

बोली बिटिया देर ना करना रूठ जाऊँगी तुमसे वरना चूड़ी लाना सभी गुलाबी छोटी बड़ी नहीं जरा भी टूटे दांत मुझे दिखलाती कलाइयों से अपनी समझाती एक लाना गुड़िया …