Category: राघवेन्द्र प्रताप सिंह

चातक प्रेम

प्रियतम मेरे, तुम्ही प्रेम हो परिभाषित। सुग्र्ह स्वर्ण रूप वाली तुम, मधुर विचार अधीन। तुम पर मनह अधर सब अटके, गीत तुम्ही जीवन संगीत।। सृजित पुष्प सी कुसमित हो …