Category: प्रांजल

आज कब्रस्ताँ मेरा, गुलशन सा जान पड़ता है।

आज कब्रस्ताँ मेरा, गुलशन सा जान पड़ता है। कब्र पर सजदे में मेरी, मेरा कातिल आज आता हे, मैं मुर्दा-गड़ा-पड़ा यहाँ, सब देख आज पाता हुँ, शोर तालियों का …

कालचक्र

कालचक्र की इस नियती से कौन यहाँ बच पाया है? निषकंलक निरपराध सीता पर भी यहाँ सवाल उठाया है! सत्य प्रेम की उस मूरत को अग्नि पर भी चलवाया …

हे तमाश-बीं ये दुनिया, तमाशा हो तुम; बेतकल्लुफी से फेरेंगे निगाहें, मन भर तो जाने दो ज़रा। -प्रान्जल जोशी।