Category: प्रदीप त्रिपाठी ‘उत्पल’

आजादी का पर्व

  आजादी का आया है पर्व,उल्लास मनायें भूखे पेटों ,  नंगे पैरों ,चिथड़ो में लिपटे जन भारत का उपहास  उड़ायें .आजादी का आया है पर्व ,…../ है मिलते नहीं …

दीपक की अभिलाषा

यदि शिखा संग देती रहेगी सदा प्रण हमारा तमस व्याप्त होगा नहीं हो विरह की अगनी से प्रकाशित धरा मिलन हो न हो तम घिरेगा  नहीं , बाँध दूंगा …

सत्य

चलो सत्य को ढूंढें ,अरण्य में बीझ विशाल तरुओं की मूलों में अंनग,म्रदामय , मिट गया वृछ के  अविर्भाव में अवशेष बीय, उर्वी उल्व में …………………………….. चलो सत्य को …

प्रतीक्षा

एक दीपक हम जला लें ,एक दीपक तुम जला लो आध्य मुग्धा यामिनी में ,मीलित पुष्पों को खिला लो तिमिर का निहार छाए,हर विहंगम नीड़ जाये झींगुरो की तंकस्वर …

कलयुग

दुराग्रह मिथ्या का ,सत्य से युद्ध का सेना प्रपंच की ,सेनापति अन्याय का दुष्कर्मों के अश्व-गज ,कुतर्कों के शश्त्रहैं नग्नता के वस्त्र धारित ,अहं के सैनिक है दुर्भावना की …

‘स्मृति ‘

उस ओर गावं के स्कूल हमारा था छोटी -छोटी पगडण्डी से पीले -पीले सरसों के खेतों से सूने -सूने जंगल में चल कुछ पेड़ों के बीच ,तालाब किनारे स्कूल …

उद्घोष

शब्द -शब्द को जोड़ कर ;नयी पंक्तियाँ लिख डालो समय आ गया सिंह शावकों ;नव इतिहास बना डालो पांचजन्य का शंखनाद कर ;रणछेत्रों  को कूच करो रक्त बहा दो …