Category: पंकज कुमार साह

हिन्दी की व्यथा

अभी कल परसों की ही बात है हिन्दी दौड़ती-हाँफती दिल्ली पहुंची अपने आकाओं के पास, पसीने से तर-बतर होकर हाथ जोड़कर लड़खड़ाती आवाज़ में कहती है – मेरे आका …

एक नवजात शिशु द्वारा माँ को धन्यवाद ज्ञापन

माँ तुझे धन्यवाद बहुत-बहुत धन्यवाद मुझे दुनिया दिखाने के लिए, मैं तो डर ही गई थी जब पता चला की जाने वाली हूँ दुनिया से मैं दुनिया में आने …

जब तुम्हारी याद आयी..

आज अचानक तुम्हारी याद आई मेरे कानों ने तुम्हारे गीत सुने मेरी आँखे भर आयी सोचा बादलों से कुछ गुफ्तगू कर लूं तुम्हारे लिए लेकिन वो भी औरों की …

असमय ही बन पड़ती है कविताएँ ..

कभी -कभी असमय ही बन पड़ती हैं कविताएँ शब्दों के बाढ़ उमड़ पड़ते हैं जेहन में काफी तीव्र हो जाती है सोचने की शक्ति कभी -कभी तो सोच में …

आदिवासी अँधेरे में

आदिवासी तुम भी हो वो भी हैं, उनके यहाँ घूमते हैं ब्रांडेड पंखे और तुम घुमाते हो ताड़ के पंखे, उनके यहाँ बिजली बत्तियों की चकाचौंध है तुम्हारे यहाँ …