Category: निश्तर ख़ानक़ाही

हर गाम पे यह सोच के, मैं हूँ कि नहीं हूँ

हर गाम(१) पे यह सोच के, मैं हूँ कि नहीं हूँ क्या कहर है ,खुद अपनी परछाईं को देखूँ इस अहद में सानी मेरा मुश्किल से मिलेगा मैं अपने …

सौ बार लौह-ए-दिल से मिटाया गया मुझे

सौ बार लौह-ए-दिल से मिटाया गया मुझे मैं था वो हर्फ़-ए-हक़ कि भुलाया गया मुझे । इक ज़र्रा-ए-हक़ीर तेरि रहगुज़र का था लाल-ए-यमन न था कि गँवाया गया मुझे …

संदल के सर्द जंगल से आ-आ के थक गई हवा

संदल के सर्द जंगलों से आ-आ के थक गई हवा । जब भी वो बन सुलग उठे महक-महक गई हवा । इतने दिनों में ये ज़मीं बदल चुकी थी …

रिश्ता ही मेरा क्या है अब इन रास्तों के साथ

रिश्ता ही मेरा क्या है अब इन रास्तों के साथ उसको विदाअ कर तो दिया आँसुओं के साथ अब फ़िक्र है कि कैसे यह दरिया उबूर(१) हो कल किश्तियाँ …

मैं भी तो इक सवाल था हल ढूँढते मेरा

मैं भी तो इक सवाल था हल ढूँढते मेरा ये क्या कि चुटकियों में उड़ाया गया मुझे अब ये आलम है कि मेरी ज़िंदगी के रात-दिन सुबह मिलते हैं …

न मिल सका कहीं ढूँढ़े से भी निशान मेरा

न मिल सका कहीं ढूँढ़े से भी निशान मेरा । तमाम रात भटकता रहा गुमान मेरा । मैं घर बसा के समंदर के बीच सोया था । उठा तो …

धड़का था दिल कि प्यार का मौसम गुज़र गया

धड़का था दिल की प्यार का मौसम गुज़र गया । हम डूबने चले थे कि दरिया उतर गया । तुमसे भी जब निशात का इक पल न मिल सका …

दिल तेरे इंतज़ार में कल रात-भर जला

दिल तेरे इंतज़ार में कल रात- भर जला नर्गिस का फूल पिछले पहर तक खिला रहा पहले तो अपने आपसे बेजारियाँ(१)बढ़ी फिर यों हुआ कि तुझसे भी दिल ऊबने …

तेज़ रौ पानी की तीख़ी धार पर चलते हुए

तेज़ रौ पानी की तीखी धार पर चलते हुए कौन जाने कब मिलें इस बार के बिछुड़े हुए । अपने जिस्मों को भी शायद खो चुका है आदमी रास्तों …

जाँ भी अपनी नहीं, दिल भी नहीं तनहा अपना

जाँ भी अपनी नहीं, दिल भी नहीं तनहा अपना कौन कहता है कि दुख-दर्द है अपना-अपना दुश्मने-जाँ ही सही ,कोई शनासा(१)तो मिले बस्ती-बस्ती लिए फिरता हूँ सरापा अपना पुरसिशे-हाल(२)से …

छत से उतरा साथी इक

छत से उतरा साथी इक मैं और नन्हा पंछी इक सूरज निकला पाया क्या ? गुमसुम रात की रानी इक जीवन शहर दरिंदों का याद अकेली नारी इक सारे घर …

एक पल ताअल्लुक का वो भी सानेहा जैसा

एक पल तअल्लुक का वो भी सानेहा जैसा । हर ख़ुशी थी ग़म जैसी हर करम सज़ा जैसा । आज मेरे सीने में दर्द बन के जागा है वह …

आप अपनी आग के शोलों में जल जाते थे लोग

आप अपनी आग के शोलों में जल जाते थे लोग । क्या अँधेरा था कि जिससे रोशनी पाते थे लोग । गुफ़्तगू में ढूँढ़ते थे कान जज़्बों का सुराग़ …

अपने ही खेत की मट्टी से जुदा हूँ मैं तो

अपने ही खेत की मिट्टी से जुदा हूँ मैं तो । इक शरारा हूँ कि पत्थर से उगा हूँ मैं तो । मेरा क्या है कोई देखे या न …