Category: निशांत मिश्रा

पहली बार ये देखा है

इंसानों की इस बस्ती में इक अजब तमाशा देखा है, हर रोज़ यहाँ मैंने इंसानियत को मरते देखा है, हर चीज़ है बिकती इस बस्ती में, यह तो मैंने …

द्वन्द

वर्तमान में बैठा, कल्पना और यथार्थ की, पारस्परिक तुलना कर रहा हूँ, आज खुद अपने आपसे, यह द्वन्द कर रहा हूँ….. यथार्थ की भयानकता, विवश करती है मुझे, नतमस्तक …

तलाश एक नाम की

समुद्र किनारे बैठा, रेत पर लिख रहा था, मैं नाम तुम्हारा, याद कर रहा था मैं, गुजरा अतीत, सोच रहा था, अपने बीते कल को लेकर, एकाएक.. शांत व्याप्त …