Category: निर्मल शुक्ल

मेंहदी कब परवान चढ़ेगी

है तो बस, माली की चिंता कब पौधों में जान चढ़ेगी तुझे पता क्या भरते ही दम कुछ सुलगेंगे धुआँ बनेंगे कुछ पर होगी ज़िम्मेदारी रस पी लेंगे पुआ …

महक नहीं आती काँटों से

पटा रहा दिन सन्नाटों से ऐसे में अनुवाद करें क्या महक नहीं आती काँटों से इस पर वाद-विवाद करें क्या बोनों की हिक़मत तो देखो चूम रहे मेघों के …

पुरवा में वह बात कहाँ अब

पुरवा में वह बात कहाँ अब एक निरर्थक शोर रह गया । रैन भरी बोझिल-बोझिल-सी बाट जोहती पलकें सावन की आहट से झुककर उतरे श्याम धुँधलके, लेकिन पावस के …

धूप में बस्ता उठाए

धूप में बस्ता उठाए हाँफता बच्चा । तोतली-भोली निगाहें, लापता बच्चा । नींद नयनों में अभी अलसा रहीं किरनें किन्तु कक्षा के नियम मन में लगे तिरनें सभ्यता का …

खिली सुनहरी सुबह

खिली सुनहरी सुबह ग्रीष्म की बिखरे दाने धूप के। कंचन पीकर मचले बेसुध, अमलतास के गात। ओस हो गई पानी-पानी, जब तक समझे बात। रही बाँचती कुल अभियोजन, अनजाने …

इतना हुआ बस

रेत की भाषा नहीं समझी लहर इतना हुआ, बस ! बस प्रथाओं में रहो उलझे यहाँ ऐसी प्रथा है पुतलियाँ कितना कहाँ इंगित करेंगी यह व्यथा है सिलसिले स्वीकार -अस्वीकार …

अजात सम्बोधन

राम करेंगे फिर बहुरेंगे सम्मोहन गतिमान के । बहुत संकुचित हुईं हवाएँ अब सागर फिर मथा जाएगा लहरों के अनहद निबंध की देवालय फिर कथा गाएगा । फिर फूटेंगे, …