Category: निर्मल आनन्द

जल्दबाज़ी में

जल्दबाज़ी में छूट जाता है कुछ न कुछ कुछ न कुछ हो जती हैं ग़लतियाँ हड़बड़ी में पत्र लिखते हुए नहीं रहती चित्रकार के चित्र में सफ़ाई कहीं फीके …

रस्सी बुनते दादा

महीने-भर से बुन रहे हैं दादा पटसन के रेशो को अब वे आटेंगे ढेरा से हफ़्ते भर फिर तैयार होंगे रस्सी के कई गोल गुढ़ुवे इन्हीं रस्सियों से बनाएंगे …

महीने का आख़िरी सप्ताह

बहुत धीरे-धीरे बीतता है महीने का आख़िरी सप्ताह डबरों की तरह खाली हो जाते हैं सामानों के सारे डिब्बे घर के दरवाज़े से इन्हीं दिनों लौटना पड़ता है भिखारियों …

बीज-1

थोड़ी नमी थोड़ी-सी धूप थोड़ी हवा और अंगुल-भर ज़मीन चाहिए मुझे उगने के लिए थोड़ा खाद थोड़ा पानी और निगरानी चाहिए मुझे बढ़ने के लिए मैं रसदार फल के …

अगहन में किसान

वे तारों से नापते हैं रात का समय काम से रास्ते की दूरी और कड़कड़ाती ठंड में निकल पड़ते हैं बैलगाड़ियाँ लिए खेतों की ओर जाग जाते हैं खेत …

पिता

पिता तुम्हें संधि स्वीकार नहीं तुम्हारा युद्ध कब समाप्त होगा तुम्हारे झोले से निकाल लिया है किसी ने अमन की पुड़िया को मैं जानता हूँ अकबर-राणाँ जैसा नहीं होगा …

इस बार वसंत में

इस बार कुछ नहीं बदला वसंत में न बाबा का सलूखा न गुड़िया की फ़्राक न माँ की साड़ी सिर्फ़ बदली सरकार बदले राजनेता ज्यों की त्यों रही पुरानी …