Category: नेवाज़

आगे तौ कींन्हीं लगालगी लोयन

आगे तौ कींन्हीं लगालगी लोयन, कैसे छिपै अजँ जो छिपावति। तू अनुराग को सोध कियो, ब्रज की बनिता सब यौं ठहरावति॥ कौन सँकोच रह्यो है ‘नेवाज, जो तू तरसै …

तू ही को चाहत वे चित मौ अरु तू ही हियो उनपै ललचावत

तू ही को चाहत वे चित मौ अरु तू ही हियो उनपै ललचावत । मैं ही अकेली न जानत हूँ यह भेद सबै ब्रजमँडली गावत । कौन सँकोच रहो …