Category: नेमिचन्द्र जैन

धूल-भरी दोपहरी

धूल-भरी दोपहरी जगती के कण-कण में गूँजी आकुल-सी स्वर लहरी सरस पल आते-जाते करुणा सिकता भर लाते एक मूर्च्छना-सी प्राणों पर बेमाने बरसाते अलसता होती गहरी। मधुर अनमनी उदासी …

जन्मदिन

परसों फिर हमेशा की तरह पत्नी बच्चे और शायद कुछ मित्र कहेंगे मुबारक हो। बार-बार आए यह दिन। मुबारक। कब तक मुबारक? बार-बार और कितनी बार चौहत्तर के बाद? …

आज फिर जब तुमसे सामना हुआ

कितने दिनों बाद आज फिर जब तुमसे सामना हुआ उस भीड़ में अकस्मात , जहाँ इसकी कोई आशंका न थी, तो मैं कैसा अचकचा गया रँगे हाथ पकड़े गये …