Category: नीरज सारंग

मछुवारा मृत्यु और प्रेम दोनों ही है

मछुवारा मछली को अपने आभासी जाल में फँसा लेता है और उसे उसके जीवन और संसार से मुक्त कर देता है मछुवारा मृत्यु और प्रेम दोनों ही है लेकिन …

जहाँ अपने गीतों के माध्यम से

जहाँ अपने गीतों के माध्यम से मूल्य और परिचय न लिया जाता हो जिस सभा में गीत सुनने के बाद कोई हँसी-रूदन नहीं करता हो जहाँ विश्व भर के …

रह जाएंगे प्रेम तेरे लिखे गीत मेरे

सूनेपन की गरज-बरस में मन मेरा भीगे रिमझिम बारिश की टप-टप बूँदों में तू आ जा आकाश की ओढ़नी ओढ़े सिमट-लिपट कर मुझे सुला तू हृदय की दीवारों में …

जहाँ कहीं भी मेरे पग पड़ते थे

गाँव से दूर, पार इन उँची पहाड़ियों के दूर-दूर तक जहाँ नदी-झरने नहीं मेरे पूर्व ही है यहाँ उनकी खेती भय-संदेह के पुष्प खिले हैं मन में अब आगे …

मैं क्या गीत गाऊँ?

पंछी का घोंसला ही पिंजरा हो गया है भाग्य-रेखा में क्या यहीं अंकित था? हे सर्वश्रेष्ठ किसान! तूने खेत-खलिहान, पर्वत, नदी, जलधि, वायु, प्रकाश की खेती की थी जिस …

सूर्य शीघ्रता से सोते ही जा रहा

संध्या हो रही, दिन बीत रहा है अपने घोंसलों की ओर पक्षी उड़ आ रहें तटहीन जलधि पार कर लौट रहें हैं प्रतीत होता है तू भी होगा झुण्ड …

लेकिन पथिक मैं था हो ही गया

उस नयी प्रभात को धुंधली आँखें मेरी कोहरे से भरे पथ पर सहसा खुंली मैंने दूर तक देखने का प्रयत्न किया सुनसान, अज्ञात दूरी और झाड़ियाँ दिखीं लेकिन पथिक …

जग त्याग उड़ जाना मुझको न भाता

वेदना-वर्षा बेरोक घोंसलें में है आती बोल पंछी की अंधेरे में मिलती जाती सूने-सूने घोंसलें में अकेले हूँ जीता जग त्याग उड़ जाना मुझको न भाता वो दिन न …

कण प्राप्त नहीं किसी को

जीवन-संध्या की बोल का कष्ट पीर तीर का वस्त्र किया धारण फंसे हुए हैं प्रत्येक नीच-श्रेष्ठ दूर नहीं कोई किसी भी कारण वेदना! तू भेंद न मन को बढ़कर …

मेरे भारत का भार उठा ले

मैं अपने देश सहित भूला हुआ अज्ञानी हवाओं संग मग्न झूलता हे ईशवर! अपने संविधान के ज्ञान हेतु कृपया देश को अब शिष्य बना प्रत्येक का तू ही बन …

मृत्यु का यह कैसा असर?

रक्त की सरिता बह रही थी प्रतिक्षण कट रहे थे सिर विकराल मुँह खोल रहा था मृत्यु का यह कैसा असर? विजय किसकी निर्णय ज्ञात नहीं गूँज “मारो अन्यथा …

स्वप्न में ही मोहें प्रभु के संग अभिनय करे दे

ओ री! बांवरी बयारिया सुन इक मोरी बतिया सूनी मन की नगरिया, बीते दिन नाहीं रतिया पल-पल मोरे नैंन विरह के कोमल गीत गायें सुहावन सुबह न लागे, मनभावन …

वसुंधरा जैसी परी की है तू जननी

दक्षिण-सागर में है मयूरों की सभ्यता उनके नीले पंखों ने सागर को रंगा पंख-किलकारियों से सिन्धु-पवन आयी मुझे भी ले चल, जिधर तू गाते चली तू पर से उत्पन्न …

संदेही सरि की मँझधार में हो जाती

हिय-वीणा पर बज रहे कीर्तन भजन आरती संदेही सरि की मँझधार में हो जाती मेरे सुर की तरणी-दिशा में विकार की सुध होने लगती तेरे मधुर मुग्ध मधु मंजरी …