Category: नज़ीर बनारसी

हर गाम पे हुशियार बनारस की गली में

बनारस की गली हर गाम पे हुशियार बनारस की गली में फ़ितने भी हैं बेदार बनारस की गली में ऐसा भी है बाज़ार बनारस की गली में बिक जाएँ …

मुफ़लिसी थी तो उसमें भी एक शान थी

मुफ़लिसी थी तो उसमें भी एक शान थी कुछ न था, कुछ न होने पे भी आन थी चोट खाती गई, चोट करती गई ज़िन्दगी किस क़दर मर्द मैदान थी …

बुतख़ाना नया है न ख़ुदाख़ाना नया है

बुतख़ाना नया है न ख़ुदाख़ाना नया है जज़्बा है अक़ीदत का जो रोज़ाना नया है इक रंग पे रहता ही नहीं रंगे ज़माना जब देखिए तब जल्वाए जानानां नया है दम …

बुझा है दिल भरी महफिल को रौशनी देकर

बुझा है दिल भरी महफ़िल में रौशनी देकर मरूँगा भी तो हज़ारों को ज़िन्दगी देकर क़दम-क़दम पे रहे अपनी आबरू का ख़याल गई तो हाथ न आएगी जान भी …

गंगा का है लड़कपन गंगा की है जवानी

गंगा का है लड़कपन गंगा की है जवानी इतरा रही हैं लहरें शरमा रहा है पानी दोहराए जा रही है बरसात की कहानी बीते हुए ज़माने गुज़री हुई कहानी …

ख़मे मेहराबे हरम भी ख़मे अब्रू तो नहीं

ख़मे मेहराबे हरम भी ख़मे अबू तो नहीं कहीं काबे में भी काशी के सनम तू तो नहीं तिरे आँचल में गमकती हुई क्या शै है बहार उनके गेसू …

इक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ

इक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ मुफ़लिस का दिया हूँ मगर आँधी से लड़ा हूँ जो कहना हो कहिए कि अभी जाग रहा हूँ सोऊँगा तो …