Category: नवनीत पाण्डे

मुझे देखने है

मुझे देखने है सारे अदेखे दृष्य मुझे जानने है सारे अज्ञाने ज्ञान मुझे समेटने है सारे बिखराव बस इसी एक आस में बैठा हूं कब से इस नंगधड़ंग तार …

हमारे हाथ

अलसुबह नींद से जागने से रात को सोने तक कितनी चीज़ें गुज़रती है हाथों से होकर पता नहीं क्या-क्या करते हैं हाथ पता नहीं कुछ भी नहीं रहता टिका …

स्त्री के मन की किताब..

रोज अलसुबह सबसे पहले जागकर सारा घर बुहारती, संवारती है लगता है.. वह घर नहीं घर में रहनेवालों का दिन संवारती है रोज गए रात सबके सो चुकने के …

शब्दों से ही लड़ूंगा

मत मानों मत स्वीकारो चाहे जितनी बार मारो नोच लो पर फ़िर भी उड़ूंगा नहीं मरूंगा न ही डरूंगा किसी भय जय-पराजय से नहीं मानूंगा हार…. खुले रखे हैं …

पहाड़ के भीतर-1

चढते हुए पहाड़ पर रास्तों पर चलने के अभ्यस्त पैर डगमगाए कई बार बहुत डराया चेताया पहाड़ ने पहली बार महसूसा और जाना पहाड़ों से बतियाते हुए पहाड़ के …

न कहना.

दबते-दबते उगना आया उगते-उगते पलना पलते-पलते फ़लना आया फ़लते-फ़लते खिरना टिप टिप करते बहना आया बहते-बहते झरना झरते- झरते झुरना आया झुरते-झुरते सहना.. पढते-पढते लिखना आया लिखते-लिखते सीखना सीखते-सीखते …

तुम्हारे जाने पर

तुम्हारे जाने पर कुछ घण्टे रोएं हम तुम्हारी अंतिम यात्रा में कुछ बातें भी की तुम्हारी तुम कितने अच्छे थे, सब की इज्ज़त करते थे, सब से प्यार से …

छूटे हुए संदर्भ

जहां पहुंच कर होंठ हो जाते हैं गूंगे आंखें अंधी और कान बहरे समझ,नासमझ और मन अनमना पूरी हो जाती है हद हर भाषा की अभिव्यक्ति बेबस बंध, निर्बंध …