Category: नासिख़

चोट दिल को आहे-रसा पैदा हो

चोट दिल को आहे-रसा पैदा हो सदमा शीशे को पहुँचे तो सदा पैदा हो। कुश्ता-ए-तेगे-जुदाई हूँ, यकीं हैं मुझको अज्ब से अज्ब कलायत को जुदा पैदा हो। हम हैं, …

वाएजा मस्जिद से अब जाते हैं मयख़ाने को हम

वाएजा मस्जिद से अब जाते हैं मयख़ाने को हम फेंक कर ज़रफ़े-वज़ू लेते हैं पैमाने को हम। क्या मगस बैठे भला उस शोला-रु के जिस्म पर अपने दाग़ों से …

दम बुलबुले-असीर का तन से निकल गया

दम बुलबुले-असीर का तन से निकल गया झोंका नसीम का जूं ही सन से निकल गया। लाया वो साथ ग़ैर को मेरे जनाज़े पर शोला-सा एक ज़ेबे-कफ़न से निकल …