Category: नरेन्द्र शर्मा

हर लिया क्यों शैशव नादान

हर लिया क्यों शैशव नादान? शुद्ध सलिल सा मेरा जीवन, दुग्ध फेन-सा था अमूल्य मन, तृष्णा का संसार नहीं था, उर रहस्य का भार नहीं था, स्नेह-सखा था, नन्दन …

लौ लगाती गीत गाती

लौ लगाती गीत गाती, दीप हूँ मैं, प्रीत बाती नयनों की कामना, प्राणों की भावना पूजा की ज्योति बन कर, चरणों में मुस्कुराती आशा की पाँखुरी, श्वासों की बाँसुरी, …

युग और मैं

उजड़ रहीं अनगिनत बस्तियाँ, मन, मेरी ही बस्ती क्या! धब्बों से मिट रहे देश जब, तो मेरी ही हस्ती क्या! बरस रहे अंगार गगन से, धरती लपटें उगल रही, …

मेरे गीत बड़े हरियाले

मेरे गीत बड़े हरियाले, मैने अपने गीत, सघन वन अन्तराल से खोज निकाले मैँने इन्हे जलधि मे खोजा, जहाँ द्रवित होता फिरोज़ा मन का मधु वितरित करने को, गीत …

प्रयाग

मैं बन्दी बन्दी मधुप, और यह गुंजित मम स्नेहानुराग, संगम की गोदी में पोषित शोभित तू शतदल प्रयाग ! विधि की बाहें गंगा-यमुना तेरे सुवक्ष पर कंठहार,– लहराती आतीं गिरि-पथ …

पलाश

आया था हरे भरे वन में पतझर, पर वह भी बीत चला। कोंपलें लगीं, जो लगीं नित्य बढ़नें, बढ़ती ज्यों चन्द्रकला॥ चम्पई चाँदनी भी बीती, अनुराग-भरी ऊषा आई। जब …

नींद उचट जाती है

जब-तब नींद उचट जाती है पर क्‍या नींद उचट जाने से रात किसी की कट जाती है? देख-देख दु:स्‍वप्‍न भयंकर, चौंक-चौंक उठता हूँ डरकर; पर भीतर के दु:स्‍वप्‍नों से …

तुम रत्न-दीप की रूप-शिखा

तुम दुबली-पतली दीपक की लौ-सी सुन्दर मैं अंधकार मैं दुर्निवार मैं तुम्हें समेटे हूँ सौ-सौ बाहों में, मेरी ज्योति प्रखर आपुलक गात में मलय-वात मैं चिर-मिलनातु जन्मजात तुम लज्जाधीर …

तुम भी बोलो, क्या दूँ रानी

पगली इन क्षीण बाहुओं में कैसे यों कस कर रख लोगी एक, एक एक क्षण को केवल थे मिले प्रणय के चपल श्वास भोली हो, समझ लिया तुमने सब …

ज्योति पर्व : ज्योति वंदना

जीवन की अंधियारी रात हो उजारी! धरती पर धरो चरण तिमिर-तम हारी  परम व्योमचारी! चरण धरो, दीपंकर, जाए कट तिमिर-पाश! दिशि-दिशि में चरण धूलि छाए बन कर-प्रकाश! आओ, नक्षत्र-पुरुष, …

गंगा, बहती हो क्यूँ

विस्तार है अपार.. प्रजा दोनो पार.. करे हाहाकार… निशब्द सदा ,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ? नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई, निर्लज्ज भाव से , बहती हो क्यूँ ? …

ऐसे हैं सुख सपन हमारे

ऐसे हैं सुख सपन हमारे बन बन कर मिट जाते जैसे बालू के घर नदी किनारे ऐसे हैं सुख सपन हमारे…. लहरें आतीं, बह-बह जातीं रेखाए बस रह-रह जातीं …