Category: नरेन्द्र मोहन

चित्र में माँ

माँ के उरोज़ों के बीच बहती-लहराती नदी में डूबता-उतराता रहता था बचपन में आज मैं साठ की दहलीज पर हूँ कई तीखी-गहरी, मदमाती-उफनती नदियाँ देख चुका हूँ कई नद, …

एक खिड़की खुली है अभी

एक ही राह पर चलते चले जाने और हर आंधी से ख़ुद्को बचाते रहनेकी आदत ने आख़िर मुझे पटखी दिया उस अजीबो-गरीब हवेली में बंद होते गएजिसके बाहरी-भीतरी दरवाज़े …

स्मृति : एक हादसा

आगे देखते हुए पीछे देखना और पीछे देखते हुए आज को फलांग आगे की अटकलें एक हिक़मत पीछे त्रास, सामने लोभ और आगे ‘कुछ भी नहीं’ का अंधेरा स्मृति …