Category: नंदकिशोर आचार्य

मेरी तरह

सीने में गहरे सूखी धरती के बहती रहती है जलधार सदा बसा रहता है अपनी स्मृतियों में उजाड़ आकाश के कानों में गूँजा ही करती सब समय सन्नाटों की …

अभिधा में नहीं

जो कुछ कहना हो उसे —ख़ुद से भी चाहे— व्यंजना में कहती है वह कभी लक्षणा में अभिधा में नहीं लेकिन कभी कोई अदालत है प्रेम जैसे क़बूल अभिधा …

कविता सुनाई पानी ने-6

कोई पर्याय नहीं होता किसी संज्ञा का सर्वनाम हो सकता है किसी का भी संज्ञा नहीं मिलती किसी से सर्वनाम घुल जाते एक-दूसरे में जैसे मैं और तुम हो …

कविता सुनाई पानी ने-4

कभी देखी हैं सूने स्टेशनों पर पटरियाँ जो नहीं ले जातीं किसी को कहीं पड़ी रहती हैं केवल वहीं उजड़ा हुआ डिब्बा कभी कोई आ खड़ा होता है वहाँ …

कविता सुनाई पानी ने-2

क्या चीज़ें वही होती हैं अंधेरों में उजालों में होती हैं जैसी? ख़ुद अपने से पूछो : मैं क्या वही होता हूँ तुम्हारे उजालों से जब आता हूँ ख़ुद के …