Category: नईम

पानी उछाल के

आओ हम पतवार फेंककर कुछ दिन हो लें नदी-ताल के। नाव किनारे के खजूर से बाँध बटोरं शंख-सीपियाँ खुली हवा-पानी से सीखें शर्म-हया की नई रीतियाँ बाँचें प्रकृति पुरुष …

हम तुम

हम तुमकोशिश ही करते रह गये जनम भर¸ लेकिन वो जाने¸ क्यूं¸ कैसे – रातों–रात महान हो गये? नये संस्करण में किताब के – शब्द असम्भव शेष नहीं अब¸ …

हम कहें वो सुनें या फिर वो कहें हम सुनें

हम कहें वो सुनें या फिर वो कहें हम सुनें, होगा देखना! जब पड़ेंगे दिन छिटक कर दूर- आक्रमणों प्रत्याक्रमणों हो भले फिर चूर, तरद्दुद में पड़े मायाभारते सिर …

समय को साधना है

भूत प्रेतों को नहीं, केवल समय को साधना है।बंधु! मेरी यही पूजा-अर्चना, आराधना है। शब्द व्याकुल हैं समय के मंत्र होने के लिए और यह भाषा व्यवस्था तंत्र होने …

शामिल कभी न हो पाया मैं

शामिल कभी न हो पाया मैं¸उत्सव की मादक रून–झुन में जानबूझ कर हुआ नहीं मैं – परम्परित सावन¸ फागुन में क्या कहियेगा मेरे इस खूसठ स्वभाव को? भीड़–भाड़¸ मेले–ठेले …

लिखते कटते हाथ हमारे

लिखते कटते हाथ हमारेकिंतु जबां पर आंच न आती। लिखने कहने में अंतर है कैसे हैं ये सखा संगाती? लिखती वही वही जो कहना चाह रहा मैं दिल-दिमाग़ की …

दाग़ नहीं छूटे

दामन को मल-मलकर धोया, दाग़ नहीं छूटे । बड़ी पुण्य-भागा है शिप्रा । कालिदास के मेघदूत-सा डूबा, उतराया ठहरा, मँडराया । काट रहा हूँ अपना बोया कर्म किस फूटे …

छोड़ो-छोड़ो चरचे अब ये बहुत पुराने

छोड़ो छोड़ो चरचे अब ये बहुत पुराने। कब तक इनमें हम रस, रूप, सुगंध तलाशें? जीवित हैं कुछ शब्द और कुछ केवल लाशें। लोगों को लगता है आए नए …

चिट्टी पत्री ख़तो

चिट्टी पत्री ख़तो किताबत के मौसम फिर कब आएंगे? रब्बा जाने, सही इबादत के मौसम फिर कब आएंगे? चेहरे झुलस गये क़ौमों के लू लपटों में गंध चिरायंध की …

चाहना जागी लगे खाँचा बनाने

चाहना जागी लगे खाँचा बनाने- समय श्रम। दोनों लगे साँचा बनाने। चाहता हूँ ढालना अनुभूतियों को और प्राणों में बसे कुछ मोतियों को। रूप, रंग, आकार की क्यों फ़िक्र …

कुछ दिन हो लें नदी ताल के

आओ हम पतवार फेंककर कुछ दिन हो लें नदी ताल के नाव किनारे के खजूर से बांध बटोरें शंख-सीपियाँ खुली हवा, पानी से सीखें शर्मो-हया की नई रीतियाँ बाचें …

किसकी कुशल-क्षेम पूछें अब

किसकी कुशल-क्षेम पूछें अब, किसको अपनी पीर परोसें ? किसको कहाँ असीसें भेजें किस-किस की चुप्पी को कोसें ? फिक्रमंद इन-उनकी ख़ातिर अपनी ही गो ख़बर नहीं है । समय रुक …

काशी साधे नहीं सध रही

काशी साधे नहीं सध रही चलो कबीरा! मगहर साधें सौदा-सुलुफ कर किया हो तो उठकर अपनी गठरी बांधें इस बस्ती के बाशिंदे हम लेकिन सबके सब अनिवासी, फिर चाहे …

इन-उनकी

रहते आए जनम जनम से अमलदारियों में इन-उनकी रंग, रूप, खुशबू की खातिर खिले क्यारियों में इन-उनकी। हाल पूछते हो क्या अपने? आते नहीं नींद में सपने रातें रहीं …