Category: महेश कुमार कुलदीप

आहटें / कविता

निःशब्द निस्तब्ध निरूप आहटें ! समय की घंटी प्रति प्रात: करती -टन टन टन कनकटे अक्षविहीन क्या सचमुच बहरे ! अंतर विमुख कोलाहल रच प्रहसन होते तार उलझाये प्रच्छन्न …

कुछ हिन्दू और कुछ मुसलमान

देखो अलग अलग कब्रिस्तान हो गए | कुछ हिन्दू और कुछ मुसलमान हो गए || दुआ एक है सबकी जुबान पर लेकिन, सुनने वाला अल्लाह औ’ भगवान हो गए …

बरगद पीपल नीम …. / कविता

बरगद पीपल नीम की मीठी छांव भूल गए | शहरी हवा में ऐसे खोये, गाँव भूल गए || अल्हड़ बचपन सरपट गलियाँ कड़वी निबौरी खट्टी अमिया बाग-बगीचे खेत-कुएं के …

ख़्वार मतलबी ज़माना निकला / गज़ल

ख़्वार मतलबी ज़माना निकला | हर शख़्स बड़ा सयाना निकला || परखने जो अपनों को निकला, हर अपना मेरा बेगाना निकला || ज़ख्म नए थे मेरे लेकिन, दर्द का …

यूँ सरेआम मुझपर ……/गज़ल/महेश कुमार कुलदीप ‘माही’

यूँ सरेआम मुझपर न अंगुल उठाओ | मेरे गुनाह का कोई सबब बताओ || ज़िंदा हूँ अभी ख़ाक में मिलना बाकी है, मेरे साथ थोड़ा तो अदब दिखाओ || …

इश्क़ में जब से ….. / गज़ल / महेश कुमार कुलदीप ‘माही’

इश्क़ में जब से हम गिरफ़्तार हो गए | पल में जमाने भर के गुनहगार हो गए || रूठना नहीं अब मनाना हमें आता है, पहले से ज़्यादा हम …

मिले तुम्हारे ख़त …. / गज़ल / महेश कुमार कुलदीप

मिले तुम्हारे ख़त पुरानी दराज में | अभी तलक है ज़िंदा उसी रिवाज में || कम नहीं उदासियाँ तन्हाइयाँ मेरी, सिमट पाती नहीं मेरे तो मिजाज़ में || कदम …

आँख के मोती / गज़ल / महेश कुमार कुलदीप ‘माही’

आँख के मोती पानी हो गए | सब किस्से कहानी हो गए || दीवार एक खिंची आँगन में, रिश्ते सब बेमानी हो गए || शहर बदले हालात बदले, वो …

उनकी महफ़िल के हम भी तलबगार है / महेश कुमार कुलदीप ‘माही’

उनकी महफ़िल के हम भी तलबगार है | पर मेरे हिस्से में गुनाह हज़ार है || न शिकवा कभी न गिला हमसे, इसी बात से हम सदा शर्मसार है …