Category: महेन्द्र भटनागर

मशाल

बिखर गये हैं जिन्दगी के तार-तार रुद्ध-द्वार, बद्ध हैं चरण खुल नहीं रहे नयन क्योंकि कर रहा है व्यंग्य बार-बार देखकर गगन ! भंग राग-लय सभी बुझ रही है …