Category: महावीर उत्तरांचली

सोच का इक दायरा है, उससे मैं कैसे उठूँ

सोच का इक दायरा है, उससे मैं कैसे उठूँ सालती तो हैं बहुत यादें, मगर मैं क्या करूँ ज़िंदगी है तेज़ रौ, बह जायेगा सब कुछ यहाँ कब तलक …

हार किसी को भी स्वीकार नहीं होती

हार किसी को भी स्वीकार नहीं होती जीत मगर प्यारे हर बार नहीं होती एक बिना दूजे का, अर्थ नहीं रहता जीत कहाँ पाते यदि हार नहीं होती बैठा …

नज़र को चीरता जाता है मंज़र

नज़र को चीरता जाता है मंज़र बला का खेल खेले है समन्दर मुझे अब मार डालेगा यक़ीनन लगा है हाथ फिर क़ातिल के खंजर है मक़सद एक सबका उसको …

जां से बढ़कर है आन भारत की

जां से बढ़कर है आन भारत की कुल जमा दास्तान भारत की सोच ज़िंदा है और ताज़ादम नौ’जवां है कमान भारत की देश का ही नमक मिरे भीतर बोलता …

ग़रीबों को फ़क़त, उपदेश की घुट्टी पिलाते हो

ग़रीबों को फ़क़त, उपदेश की घुट्टी पिलाते हो बड़े आराम से तुम, चैन की बंसी बजाते हो है मुश्किल दौर, सूखी रोटियाँ भी दूर हैं हमसे मज़े से तुम …

जो व्यवस्था भ्रष्ट हो, फ़ौरन बदलनी चाहिए

जो व्यवस्था भ्रष्ट हो, फ़ौरन बदलनी चाहिए लोकशाही की नई, सूरत निकलनी चाहिए मुफ़लिसों के हाल पर, आँसू बहाना व्यर्थ है क्रोध की ज्वाला से अब, सत्ता बदलनी चाहिए …

बुलन्द अशआर—महावीर उत्तरांचली

ज़िन्दगी हमको मिली है चन्द रोज़ मौज-मस्ती लाज़मी है चन्द रोज़ प्यार का मौसम जवाँ है दोस्तो प्यार की महफ़िल सजी है चन्द रोज़ //१.// काश ! की दर्द …

शिक्षा के दोहे—दोहाकार : महावीर उत्तरांचली

दीवाने -ग़ालिब पढो, महावीर यूँ आप उर्दू -अरबी -फारसी, हिन्दी करे मिलाप // १ .// शिक्षा -दीक्षा ताक पर, रखता रोज़ गरीब बचपन बेगारी करे, फूटे हाय नसीब // …

‘छप्प्य छन्द’ और ‘कुण्डलिया छन्द’ सृजन हेतु—कवि : महावीर उत्तरांचली

‘छप्प्य छन्द‘ हिंदी छन्द परिवार का पुराना छन्द है। ‘कुण्डलिया‘ की तरह यह भी छ: पंक्तियों का छन्द है। फ़र्क़ मात्र यही है कि ‘कुण्डलिया‘ छन्द की शुरूआत ‘दोहे‘ …

विजयदिवस (KARGIL WAR 1999)—महावीर उत्तरांचली

धन्य हमारी मातृभूमि; धन्य हमारे वीरवर। लौट आये कालमुख से; शत्रू की छाती चीरकर।। बढ़ चले विजयनाद करते; काल को परास्त कर। रीढ़ शत्रू का तोड़ आये; वज्र मुश्त …

पतन—महावीर उत्तरांचली

मानव को अनेक चिन्ताएं चिन्ताओं के अनेक कारण कारणों के नाना प्रकार प्रकारों के विविध स्वरुप स्वरूपों की असंख्य परिभाषायें परिभाषाओं के महाशब्दजाल शब्दजालों के घुमावदार अर्थ प्रतिदिन अर्थों …

विरासत—महावीर उत्तरांचली

जानते हो यार मैंने विरासत में क्या पाया है? जहालत, मुफलिसी, बेरुख़ी तृषकार, ईष्या, कुंठा आदि-आदि शब्दों की निरंतर लम्बी होती सूची जो भविष्य में– एक विस्तृत / विशाल …

महानगर में—महावीर उत्तरांचली

कौन से उज्जवल भविष्य की ख़ातिर हम पड़े हैं— महानगर के इस बदबूदार घुटनयुक्त वातावरण में। जहाँ साँस लेने पर टी० बी० होने का ख़तरा है जहाँ अस्थमा भी …

पाँव—कवि: महावीर उत्तरांचली

पाँव थककर भी चलना नहीं छोड़ते जब तक वे गंतव्य तक न पहुँच जाएँ … थक जाने पर कुछ देर राह में विश्राम कर पुन: चल पड़ते हैं अपने …

टूटा हुआ दर्पण—महावीर उत्तरांचली

एक टीस-सी उभर आती है जब अतीत की पगडंडियों से गुजरते हुए — यादों की राख़ कुरेदता हूँ। तब अहसास होने लगता है कितना स्वार्थी था मेरा अहम्? जो …

फूल खिले हैं प्यार के—महावीर उत्तरांचली

फूल खिले हैं प्यार के गले मिलो गुलनार के साये में दीवार के फूल खिले हैं ………………. जीतो अपने प्यार को लक्ष्य करो संसार को अपना सब कुछ हार …

कविनामी दोहे—दोहाकर : महावीर उत्तरांचली

सब कहें उत्तरांचली, ‘महावीर’ है नाम करूँ साहित्य साधना, है मेरा यह काम //१. // ‘महावीर’ बुझती नहीं, अंतरघट तक प्यास मृगतृष्णा मिटती नहीं, मनवा बड़ा हतास //२. // …

कृष्ण नामी दोहे—दोहाकार : महावीर उत्तरांचली

गीता मै श्री कृष्ण ने, कही बात गंभीर औरों से दुनिया लड़े, लड़े स्वयं से वीर //१. // लाल यशोदानंद का, गिरिधर माखन चोर दिखता है मुझको वहां, मै …

राम नामी दोहे—दोहाकार: महावीर उत्तरांचली

देह जाय तक थाम ले, राम नाम की डोर फैले तीनों लोक तक, इस डोरी के छोर //१. // भक्तों में हैं कवि अमर, स्वामी तुलसीदास ‘रामचरित मानस’ रचा, …

प्रदूषण के दोहे—दोहाकार : महावीर उत्तरांचली

शुद्ध नहीं आबो-हवा, दूषित है आकाश सभ्य आदमी कर रहा, स्वयं श्रृष्टि का नाश //१// ओजोन परत गल रही, प्रगति बनी अभिशाप वक़्त अभी है चेतिए, पछ्ताएंगे आप //२// …

पर्यावरण के दोहे—कवि: महावीर उत्तरांचली

छह ऋतु, बारह मास हैं, ग्रीष्म-शरद-बरसात स्वच्छ रहे पर्यावरण, सुबह-शाम, दिन-रात // १ // कूके कोकिल बाग में, नाचे सम्मुख मोर मनोहरी पर्यावरण, आज बना चितचोर // २ // …

महंगाई के दोहे—दोहाकार : महावीर उत्तरांचली

महंगाई डायन डसे, निर्धन को दिन-रात धनवानों की प्रियतमा, पल-पल करती घात //१// महंगाई के राग से, बिगड़ गए सुरताल सिर पर चढ़कर नाचती, झड़ते जाएँ बाल //२// महंगी …

१५ क्षणिकाएँ—क्षणिकाकार: महावीर उत्तरांचली

(१.) तार ———– आत्मा एक तार है जोड़ रखा है जिसने जीवन को मृत्यु से और मृत्यु को जोड़ा है … पुन: नवसृजन से …. (२.) क्रांति ————- परत-दर-परत …

कुण्डलिया छंद—कुण्डलियाकार: महावीर उत्तरांचली

(१. ) राधा-रानी कृषण की, थी बचपन की मीत मीरा ने भी सुन लिया, बंसी का संगीत बंसी का संगीत, हरे सुध-बुध तन-मन की मुरलीधर गोपाल, खबर तो लो …

मैंने इस संसार में, झूठी देखी प्रीत—महावीर उत्तरांचली

मैंने इस संसार में, झूठी देखी प्रीत मेरी व्यथा-कथा कहे, मेरा दोहा गीत मैंने इस संसार में …. मुझको कभी मिला नहीं, जो थी मेरी चाह सहज न थी …