Category: महावीर उत्तरांचली

छिन गया रुत्बा तो क्या है

छिन गया रुत्बा तो क्या है पास अपने हौसला है तूने मुझको मन से चाहा दिल कहे तू देवता है तूने छोड़ा उसपे सब कुछ देख वो क्या मांगता …

थोड़ा और गहरे उतरा जाये

थोड़ा और गहरे उतरा जाये तब जाकर इश्क में डूबा जाये लफ़्ज़ों में शामिल अहसासों को महसूस करूँ तो समझा जाये है ज़रूरी ये कोरे काग़ज़ पर जो सोचा …

अमर गीत “आएगा आने वाला” व “महल” से जुड़ी त्रासदियाँ

जी हैं, शीर्षक से सही पहचाना आप सबने। मैं ज़िक्र कर रहा हूँ “महल” (1949) की फ़िल्म का। जिसके निर्देशक थे कमाल अमरोही। संगीतकार थे खेमचन्द प्रकाश। चार गीत (नक्शब …

31 जुलाई और दो सितारे (प्रेमचन्द, रफ़ी पर विशेष)

लेख शुरू करने से पूर्व मैं पाठकों को दो चित्रों से अवगत करना चाहूंगा:— पहला चित्र:— “प्रेमचंद” की शवयात्रा गुज़र रही थी। तब सामने से गुज़रते किसी अपरिचित व्यक्ति …

काल के कपाल पर दर्ज़ रहेंगे बी मोहन नेगी के चित्र

हमें बहुत प्यारे लगते हैं / वीर बाँकुरे गढ़वाली / सीमा पर, अपलक जगते हैं / वीर बाँकुरे गढ़वाली / मातृभूमि का चप्पा-चप्पा / इनके शोणित से संचित / …

प्रकृति चित्र

यह प्रकृति का चित्र अति उत्तम बना है “मत कहो आकाश में कुहरा घना है” प्रतिदिवस ही सूर्य उगता और ढलता चार पल ही ज़िन्दगी की कल्पना है लक्ष्य पाया …

ये व्यवस्था कैसी है

सीनाज़ोरी, रिश्वतखोरी, ये व्यवस्था कैसी है होती है पग-पग पर चोरी, ये व्यवस्था कैसी है कष्टों में गुज़रे जीवन, जाने कैसा दौर नया टूटी आशाओं की डोरी, ये व्यवस्था …

सोच का इक दायरा है, उससे मैं कैसे उठूँ

सोच का इक दायरा है, उससे मैं कैसे उठूँ सालती तो हैं बहुत यादें, मगर मैं क्या करूँ ज़िंदगी है तेज़ रौ, बह जायेगा सब कुछ यहाँ कब तलक …

हार किसी को भी स्वीकार नहीं होती

हार किसी को भी स्वीकार नहीं होती जीत मगर प्यारे हर बार नहीं होती एक बिना दूजे का, अर्थ नहीं रहता जीत कहाँ पाते यदि हार नहीं होती बैठा …

नज़र को चीरता जाता है मंज़र

नज़र को चीरता जाता है मंज़र बला का खेल खेले है समन्दर मुझे अब मार डालेगा यक़ीनन लगा है हाथ फिर क़ातिल के खंजर है मक़सद एक सबका उसको …

जां से बढ़कर है आन भारत की

जां से बढ़कर है आन भारत की कुल जमा दास्तान भारत की सोच ज़िंदा है और ताज़ादम नौ’जवां है कमान भारत की देश का ही नमक मिरे भीतर बोलता …

ग़रीबों को फ़क़त, उपदेश की घुट्टी पिलाते हो

ग़रीबों को फ़क़त, उपदेश की घुट्टी पिलाते हो बड़े आराम से तुम, चैन की बंसी बजाते हो है मुश्किल दौर, सूखी रोटियाँ भी दूर हैं हमसे मज़े से तुम …

जो व्यवस्था भ्रष्ट हो, फ़ौरन बदलनी चाहिए

जो व्यवस्था भ्रष्ट हो, फ़ौरन बदलनी चाहिए लोकशाही की नई, सूरत निकलनी चाहिए मुफ़लिसों के हाल पर, आँसू बहाना व्यर्थ है क्रोध की ज्वाला से अब, सत्ता बदलनी चाहिए …

शिक्षा के दोहे

दीवाने -ग़ालिब पढो, महावीर यूँ आप उर्दू -अरबी -फारसी, हिन्दी करे मिलाप // १ .// शिक्षा -दीक्षा ताक पर, रखता रोज़ गरीब बचपन बेगारी करे, फूटे हाय नसीब // …

‘छप्पय छन्द’ और ‘कुण्डलिया छन्द’ सृजन हेतु

‘छप्पय छन्द‘ हिंदी छन्द परिवार का पुराना छन्द है। ‘कुण्डलिया‘ की तरह यह भी छ: पंक्तियों का छन्द है। फ़र्क़ मात्र यही है कि ‘कुण्डलिया‘ छन्द की शुरूआत ‘दोहे‘ …

वीरवर

धन्य हमारी मातृभूमि; धन्य हमारे वीरवर। लौट आये कालमुख से; शत्रू की छाती चीरकर।। बढ़ चले विजयनाद करते; काल को परास्त कर। रीढ़ शत्रू का तोड़ आये; वज्र मुश्त …

पतन

मानव को अनेक चिन्ताएं चिन्ताओं के अनेक कारण कारणों के नाना प्रकार प्रकारों के विविध स्वरुप स्वरूपों की असंख्य परिभाषायें परिभाषाओं के महाशब्दजाल शब्दजालों के घुमावदार अर्थ प्रतिदिन अर्थों …

विरासत

जानते हो यार मैंने विरासत में क्या पाया है? जहालत, मुफलिसी, बेरुख़ी तृषकार, ईष्या, कुंठा आदि-आदि शब्दों की निरंतर लम्बी होती सूची जो भविष्य में– एक विस्तृत / विशाल …

महानगर में

कौन से उज्जवल भविष्य की ख़ातिर हम पड़े हैं— महानगर के इस बदबूदार घुटनयुक्त वातावरण में? जहाँ साँस लेने पर टी० बी० होने का ख़तरा है जहाँ अस्थमा भी …

टूटा हुआ दर्पण

एक टीस-सी उभर आती है जब अतीत की पगडंडियों से गुजरते हुए — यादों की राख़ कुरेदता हूँ। तब अहसास होने लगता है कितना स्वार्थी था मेरा अहम्? जो …