Category: एम० के० मधु

पुल बनते दद्दा

तुम्हारी बूढ़ी आंखें और मूंठ वाली लाठी पुल बनते-बनते रुक जाती हैं दो गांवों के बीच रिश्तों की धार बार-बार तेज़ हो जाती है और बहा ले जाती है …

क्यों नहीं बनते सीमेंट

रेत की तरह क्यों भुरभुरे हो रामदहीन क्यों नहीं बनते सीमेंट और जोड़ते परिवार सोचो रामदहीन क्यों हो जाता है तुम्हारा घोंसला तार-तार गारे लगाते ईंट जोड़ते चालीस पहुँच …

ज़िंदगी लिखते हुए

हवा की सीढ़ियां चढ़ मिट्टी आकाश को उड़ रही उफ़नता समुद्र में डूबता सूर्य कुछ कहता रहा चांद के मौन पर जुगनुएं चीख़ती रहीं स्याह रातें कुछ अनकही कहती …

स्वर्ग-नरक

बचपन में बादलों की अंधेरी गुफा में डूबते सूर्य को देखा है मैंने कई बार और कई बार अंधेरे से उबरते उस प्रकाशपुंज को टुकड़ा-टुकड़ा फिर पूर्ण आकार लेते …

एक संपूर्ण आकार

हर सुबह खुलती है मेरी नींद मस्जिद की अज़ान से शुरू करता हूं अपनी दिनचर्या मंदिर की घंटियों के साथ मन को करता हूं शोधित गिरजा की कैरोल-ध्वनि पर …

है हवाओं को इंतज़ार

आज मेरे आकाश पर बनता है इन्द्रधनुष किन्तु रंगहीन आज मेरे मंदिर में बजती हैं घंटियां किन्तु स्वरहीन मेरे सितार पर सजते हैं गीत किन्तु लयविहीन मेरे चित्रपट पर …

प्रायश्चित

मेरे अजाने पुरुष कब तुम अपनी चरण-धूलि से धूसरित करोगे मेरी जोहती बाट को जो क्षितिज की चौखट पर बैठकर युगों से जोह रही हूं मेरे अजाने पुरुष रश्मिरथी …

आत्मशोध

मैंने स्वयं एक चक्रव्यूह रचा है मैंने स्वयं अभिमन्यु की भूमिका अदा की है मैंने स्वयं ही जयद्रथ बन अपने अभिमन्यु की हत्या कर डाली और मृत्यु से पहले …

स्वर्ण-किरण

पंचवटी को रौंदता कुलाचें भरता वह सोने का हिरण मारीच की आत्मा लिए सपने बिखेरता वह स्वर्ण-किरण ॠषियों का वन मिट्टी का कण फूल-पत्तों का मन चांदनी-चमन सब रोक …

कुरुक्षेत्र

मैं नहीं जन्मा हूँ सूर्य से प्राप्त कवच, कुंडल लेकर मेरे साथ है पिता प्रदत्त सत्य जो किसी भी युद्ध को जीतने में है सक्षम मैं करता नहीं प्रयोग …

बदलने का सुख

बदलने का सुख ये उंगलियां जो कभी इंगित होती थीं दूसरों के घरों में सूराख़ तलाशने अब मुट्ठी बन आकाश में लहराती हैं और बनती हैं आवाज़ उन सूराख़ों …