Category: केदारनाथ अग्रवाल

बच्चे के जन्म पर

हाथी-सा बलवान, जहाजी हाथों वाला और हुआ सूरज-सा इंसान, तरेरी आँखों वाला और हुआ एक हथौड़े वाला घर में और हुआ माता रही विचार अंधेरा हरने वाला और हुआ …

वह चिड़िया जो

वह चिड़िया जो- चोंच मार कर दूध-भरे जुंडी के दाने रुचि से, रस से खा लेती है वह छोटी संतोषी चिड़िया नीले पंखों वाली मैं हूँ मुझे अन्‍न से …

हमारी जिन्दगी

हमारी जिन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं। हमेशा काम करते हैं, मगर कम दाम मिलते हैं। प्रतिक्षण हम बुरे शासन– बुरे शोषण से पिसते हैं!! अपढ़, अज्ञान, …

हम और सड़कें

सूर्यास्त मे समा गयीं सूर्योदय की सड़कें, जिन पर चलें हम तमाम दिन सिर और सीना ताने, महाकाश को भी वशवर्ती बनाने, भूमि का दायित्व उत्क्रांति से निभाने, और …

लंदन में बिक आया नेता

लंदन में बिक आया नेता, हाथ कटा कर आया । एटली-बेविन-अंग्रेज़ों में, खोया और बिलाया ।। भारत-माँ का पूत-सिपाही, पर घर में भरमाया । अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद का, उसने डिनर …

मात देना नहीं जानतीं

घर की फुटन में पड़ी औरतें ज़िन्दगी काटती हैं मर्द की मौह्ब्बत में मिला काल का काला नमक चाटती हैं जीती ज़रूर हैं जीना नहीं जानतीं; मात खातीं- मात …

मजदूर का जन्म

एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ ! हाथी सा बलवान, जहाजी हाथों वालाऔर हुआ ! सूरज-सा इंसान, तरेरी आँखोंवाला और हुआ !! एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ! माता रही विचारः अँधेरा …

पहला पानी

पहला पानी गिरा गगन से उमँड़ा आतुर प्यार, हवा हुई, ठंढे दिमाग के जैसे खुले विचार । भीगी भूमि-भवानी, भीगी समय-सिंह की देह, भीगा अनभीगे अंगों की अमराई का …

आज नदी बिलकुल उदास थी

आज नदी बिलकुल उदास थी। सोई थी अपने पानी में, उसके दर्पण पर- बादल का वस्त्र पडा था। मैंने उसको नहीं जगाया, दबे पांव घर वापस आया।

ओस की बूंद कहती है

ओस-बूंद कहती है; लिख दूं नव-गुलाब पर मन की बात। कवि कहता है : मैं भी लिख दूं प्रिय शब्दों में मन की बात॥ ओस-बूंद लिख सकी नहीं कुछ नव-गुलाब …

कनबहरे

कोई नहीं सुनता झरी पत्तियों की झिरझिरी न पत्तियों के पिता पेड़ न पेड़ों के मूलाधार पहाड़ न आग का दौड़ता प्रकाश न समय का उड़ता शाश्वत विहंग न …

कंकरीला मैदान

कंकरीला मैदान ज्ञान की तरह जठर-जड़ लम्बा चौड़ा गत वैभव की विकल याद में- बडी दूर तक चला गया है गुमसुम खोया। जहाँ-तहाँ कुछ कुछ दूरी पर, उसके उँपर, …

जिन्दगी

देश की छाती दरकते देखता हूँ! थान खद्दर के लपेटे स्वार्थियों को, पेट-पूजा की कमाई में जुता मैं देखता हूँ! सत्य के जारज सुतों को, लंदनी गौरांग प्रभु की, …

जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है

जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है जो रवि के रथ का …